जेल से बाहर आते ही घिरे राम रहीम, कांग्रेस ने तीखे हमलों के साथ उठाए सवाल

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह एक बार फिर जेल से बाहर आ चुका है, जिससे राजनीतिक सरगर्मी काफी तेज हो गई है। हाल ही में उसे 21 दिन की फरलो पर रोहतक की सुनारिया जेल से बाहर भेजा गया है, जिसके बाद से वह अपने सिरसा स्थित डेरा मुख्यालय में रहेगा। इस घटनाक्रम के सामने आते ही विपक्षी दलों ने सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए हैं। जानकारों का मानना है कि इस तरह के फैसलों से न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर आम जनता के बीच कई तरह के सवाल पैदा होते हैं, जो आने वाले दिनों में सियासी भूचाल का कारण बन सकते हैं।

कांग्रेस ने बीजेपी पर बोला तीखा हमला

राम रहीम के बाहर आने पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने सत्ताधारी पार्टी पर जमकर निशाना साधा है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि एक तरफ सरकार महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ गंभीर मामलों में दोषी ठहराए गए व्यक्तियों को बार-बार राहत मिल जाती है। आलोचकों का आरोप है कि ऐसे कदम समाज में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गलत संदेश देते हैं। राजनीतिक मंचों से यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि कानून के शिकंजे में कसने के बावजूद इस तरह की रियायतें मिलना न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाती हैं।

बार-बार मिलने वाली राहत पर खड़े हुए गंभीर सवाल

आंकड़ों पर गौर करें तो साल 2017 में गिरफ्तारी के बाद से राम रहीम को कई बार पैरोल या फरलो मिल चुकी है, जिसके चलते उसने काफी लंबा समय जेल के बाहर बिताया है। इस साल भी यह तीसरी बार है जब वह जेल की चारदीवारी से बाहर आया है। कानूनी जानकारों और सामाजिक संगठनों का एक बड़ा वर्ग इस बात को लेकर चिंतित है कि किसी सजायाफ्ता कैदी को बार-बार इस तरह की छूट मिलने से न्याय प्रणाली की निष्पक्षता प्रभावित होती है। हालांकि, प्रशासनिक और कानूनी जानकारों का यह भी तर्क है कि यह सब मौजूदा जेल नियमावली और कानूनी प्रावधानों के तहत ही तय प्रक्रियाओं के माध्यम से होता है।

अदालती मामलों और आगे की कानूनी राह पर नजर

इस पूरे प्रकरण में सिर्फ फरलो या पैरोल का मुद्दा ही नहीं, बल्कि अदालती लड़ाइयां भी सुर्खियों में बनी हुई हैं। कुछ समय पहले एक पुराने मामले में आए फैसले के खिलाफ उच्च अदालतों में भी सुनवाई और चर्चाएं देखने को मिली हैं, जहां जांच और सरकारी रवैये को लेकर तीखी टिप्पणियां सामने आई थीं। सर्वोच्च अदालत और अन्य उच्च न्यायालयों में इन मामलों की गूंज यह दर्शाती है कि कानूनी प्रक्रिया अभी पूरी तरह थमी नहीं है। अब देखना यह होगा कि इस राजनीतिक बयानबाजी और कानूनी पेचीदगियों के बीच आने वाले समय में अदालती रुख क्या रहता है और प्रशासनिक स्तर पर इसमें क्या नए मोड़ आते हैं।

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