गोरखपुर की इन 3 माँओं के संघर्ष के आगे फीकी है हर कहानी; दर्द को बनाया ढाल और रच डाला नया इतिहास।

गोरखपुर के गोरखनाथ क्षेत्र की रहने वाली 51 वर्षीय पुष्पलता सिंह ने अपनी पूरी जिंदगी उन लोगों के नाम कर दी है, जिनका दुनिया में कोई नहीं है। पेशे से शिक्षिका पुष्पलता ने कम उम्र में ही शादी न करने का फैसला लिया था, जिसका कारण एक विचलित कर देने वाली घटना थी। बचपन में उन्होंने एक महिला को कड़ाके की ठंड में कूड़ा बीनते देखा और उसी क्षण तय किया कि वे असहायों का सहारा बनेंगी। आज वे कूड़ा बीनने वाले बच्चों की पढ़ाई और बीमार बुजुर्गों के इलाज का जिम्मा उठा रही हैं। सेवा के इस रास्ते में उन्हें कई चोटें भी आईं—एक बार विक्षिप्त बुजुर्ग की मदद करते समय उनका हाथ टूट गया और एक बार संक्रमण से वे खुद गंभीर बीमार हुईं, लेकिन उनके हौसले आज भी हिमालय जैसे अडिग हैं।

गोबर के उपलों से बुना सेना का सपना: आत्मनिर्भरता की मिसाल बनीं संगीता

जहाँ लोग छोटे काम करने में शर्म महसूस करते हैं, वहीं संगीता ने अपनी मेहनत से सफलता की नई इबारत लिखी। परिवार की आर्थिक स्थिति और बच्चों की शिक्षा के लिए उन्होंने गोबर के उपले बनाने का काम शुरू किया। शुरुआत में यह संघर्ष अकेले था, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने अपने साथ गांव की अन्य 50 महिलाओं को जोड़कर उन्हें रोजगार दिया। संगीता की मेहनत का ही परिणाम है कि आज उनका बेटा भारतीय सेना में देश की सेवा कर रहा है। संगीता का मानना है कि एक माँ अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए किसी भी बाधा को पार कर सकती है। आज वे उन महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं जो घर से निकलकर कुछ बड़ा करना चाहती हैं।

500 अनाथों की ‘यशोदा’ बनीं उषा दास: जंगल में छोड़े गए बच्चों को दी नई जिंदगी

जेल बाईपास रोड की निवासी उषा दास पिछले 26 वर्षों से उन बच्चों की माँ बनी हुई हैं, जिन्हें अपनों ने ही ठुकरा दिया। वे बताती हैं कि कई बार उन्हें ऐसे नवजात मिलते हैं जिन्हें उनके माता-पिता जन्म लेते ही जंगल में छोड़ जाते हैं। उषा अब तक 500 से अधिक बच्चों की जिंदगी संवार चुकी हैं। वर्तमान में उनके संरक्षण में 45 बच्चे रह रहे हैं, जिन्हें वे न केवल भोजन और छत दे रही हैं, बल्कि बेहतर शिक्षा भी सुनिश्चित कर रही हैं। कूड़ा बीनने वाले बच्चों से लेकर अनाथों तक, उषा की ममता सबके लिए एक समान है। उनके पढ़ाए कई बच्चे आज समाज में प्रतिष्ठित पदों पर काम कर रहे हैं, जो उनकी निस्वार्थ सेवा का सबसे बड़ा पुरस्कार है।

त्याग और समर्पण की त्रिवेणी: समाज के लिए एक नई सीख

ये तीनों कहानियाँ हमें सिखाती हैं कि समाज सेवा के लिए केवल धन की नहीं, बल्कि बड़े दिल की जरूरत होती है। पुष्पलता का त्याग, संगीता का परिश्रम और उषा दास की ममता मिलकर गोरखपुर को एक नई पहचान दे रहे हैं। ये महिलाएँ न केवल उन बच्चों और बेसहारा लोगों का भविष्य बदल रही हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए एक आदर्श भी स्थापित कर रही हैं। आज के भागदौड़ भरे युग में, जहाँ लोग अपनों को भूल जाते हैं, वहाँ इन ‘सुपरमॉम्स’ का यह प्रयास मानवता की मशाल को जलाए हुए है।

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