अचानक थम गई कर्नाटक की राजनीति की एक मजबूत आवाज! मंत्री डी. सुधाकर के निधन से कांग्रेस में शोक की लहर

कर्नाटक की राजनीति से रविवार को एक बेहद दुखद खबर सामने आई, जिसने कांग्रेस पार्टी समेत पूरे राज्य को शोक में डुबो दिया। राज्य सरकार में मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता डी. सुधाकर का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। पिछले काफी समय से उनका इलाज चल रहा था और उनकी तबीयत लगातार खराब बनी हुई थी। डॉक्टरों की निगरानी में इलाज के बावजूद आखिरकार उन्होंने जिंदगी की आखिरी सांस ली। जैसे ही उनके निधन की खबर सामने आई, राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर दौड़ गई। कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच भी गहरा दुख देखा गया। डी. सुधाकर को एक शांत स्वभाव, जमीन से जुड़े और जनता की समस्याओं को समझने वाले नेता के रूप में जाना जाता था। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में कई अहम जिम्मेदारियां निभाईं और जनता के लिए लगातार काम किया। उनके निधन को कर्नाटक की राजनीति के लिए बड़ी क्षति माना जा रहा है।

डीके शिवकुमार ने जताया दुख, कहा- पार्टी ने अपना करीबी साथी खो दिया

डी. सुधाकर के निधन पर कर्नाटक के डिप्टी मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भावुक पोस्ट साझा करते हुए कहा कि डी. सुधाकर केवल राजनीतिक सहयोगी नहीं बल्कि बेहद करीबी मित्र भी थे। उन्होंने लिखा कि लंबे समय से बीमारी से जूझ रहे सुधाकर ने अंतिम समय तक जनता की सेवा का जज्बा नहीं छोड़ा। डीके शिवकुमार ने कहा कि उन्होंने हिरियूर से विधायक, चित्रदुर्ग जिले के प्रभारी मंत्री और प्लानिंग एवं स्टैटिस्टिक्स मंत्री के रूप में शानदार काम किया। उनके अनुसार डी. सुधाकर का योगदान आने वाले समय में भी याद रखा जाएगा। कई अन्य कांग्रेस नेताओं ने भी उनके निधन पर श्रद्धांजलि दी और परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की। पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि डी. सुधाकर हमेशा सरल व्यवहार और साफ राजनीति के लिए पहचाने जाते थे। यही वजह थी कि विरोधी दलों के नेता भी उनका सम्मान करते थे। उनके निधन से कांग्रेस संगठन को भी बड़ा झटका लगा है।

संघर्षों से भरा रहा डी. सुधाकर का राजनीतिक सफर

डी. सुधाकर का राजनीतिक जीवन संघर्ष और मेहनत की मिसाल माना जाता है। उन्होंने कांग्रेस पार्टी से राजनीति की शुरुआत की और साल 2004 में पहली बार चल्लाकेरे विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। जनता के बीच उनकी पकड़ मजबूत थी और वे लगातार क्षेत्र के विकास के मुद्दों पर सक्रिय रहे। बाद में परिसीमन के कारण चल्लाकेरे सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हो गई, जिसके बाद उनके सामने राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई। उस समय कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने हिरियूर सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का फैसला किया। साल 2008 में उन्होंने शानदार जीत हासिल कर यह साबित कर दिया कि जनता का भरोसा उनके साथ है। बाद में उन्होंने बी.एस. येदियुरप्पा सरकार को समर्थन दिया और सामाजिक कल्याण मंत्री बने। राजनीति में कई उतार-चढ़ाव देखने के बावजूद उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। वे हमेशा विकास और सामाजिक मुद्दों को प्राथमिकता देने वाले नेता माने गए।

जनता के बीच सादगी और काम करने की शैली से बनाई खास पहचान

डी. सुधाकर की पहचान केवल एक राजनेता के रूप में नहीं बल्कि जनता के बीच रहने वाले नेता के रूप में थी। वे अक्सर लोगों की समस्याएं सीधे सुनते थे और अधिकारियों को तुरंत कार्रवाई के निर्देश देते थे। यही कारण था कि चित्रदुर्ग और हिरियूर क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता काफी मजबूत थी। पार्टी नेताओं का कहना है कि उन्होंने कभी पद या सत्ता का घमंड नहीं किया और हमेशा साधारण जीवन शैली अपनाई। उनके करीबी बताते हैं कि बीमारी के दौरान भी वे लगातार अपने क्षेत्र की जानकारी लेते रहते थे। उनके निधन के बाद समर्थकों में मायूसी साफ देखी जा रही है। कई जगहों पर कार्यकर्ताओं ने श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित कीं और उन्हें भावुक विदाई दी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि डी. सुधाकर के जाने से कर्नाटक कांग्रेस में एक ऐसा खालीपन पैदा हुआ है जिसे भरना आसान नहीं होगा। आने वाले दिनों में राज्य सरकार और कांग्रेस पार्टी उनके योगदान को याद करते हुए कई कार्यक्रम भी आयोजित कर सकती है।

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