पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसा भूचाल आ गया है जिसकी कल्पना खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी नहीं की होगी। करीब डेढ़ दशक तक बंगाल की सत्ता पर एकछत्र राज करने वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) सत्ता से बाहर होते ही ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगी है। पार्टी के भीतर असंतोष का लावा इस कदर फूटा है कि विधायकों से लेकर सांसदों तक ने ममता बनर्जी का साथ छोड़ दिया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि ममता के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार ही अब उनके खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं। टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से 60 विधायकों ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया है और ऋतब्रत बनर्जी को अपना नया नेता चुनकर उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी बना दिया है। सत्ता का सुख भोगने वाले नेताओं के इस तरह पाला बदलने से ममता बनर्जी बेहद अलग-थलग पड़ गई हैं।
लोकसभा से राज्यसभा तक मची भगदड़, अपनों ने ही पीठ में घोंपा खंजर!
विधायकों की इस बगावत के बाद टीएमसी को सबसे बड़ा झटका देश की संसद में लगा है, जहां पार्टी के सांसदों ने एक सुर में ममता के नेतृत्व को नकार दिया है। टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने बगावत की राह पकड़ ली है। इनमें से 19 सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को बाकायदा एक पत्र लिखकर सदन में अलग गुट बनाने और एनडीए (NDA) को समर्थन देने की मांग की है। इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में काकोली घोष दस्तीदार, यूसुफ पठान, सयोनी घोष, शताब्दी रॉय और रचना बनर्जी जैसे बड़े और चौंकाने वाले नाम शामिल हैं। सिर्फ लोकसभा ही नहीं, बल्कि राज्यसभा में भी ममता को बड़ा डेंट लगा है। सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाइक जैसे कद्दावर राज्यसभा सांसदों ने न केवल अपने पद से इस्तीफा दे दिया है, बल्कि टीएमसी से अपना नाता भी तोड़ लिया है। यहाँ तक कि ममता के सबसे करीबी माने जाने वाले कल्याण बनर्जी के तेवर भी पूरी तरह बागी हो चुके हैं।
‘बंगाली अस्मिता’ वाले गढ़ में संकटमोचक बने बिहार के दो लाल
जब बंगाल के सारे बंगाली दिग्गज नेता ममता बनर्जी को राजनीतिक रूप से बेसहारा छोड़कर जा रहे हैं, तब इस भीषण सियासी बवंडर के बीच ममता बनर्जी के पीछे चट्टान की तरह बिहार के दो बड़े नेता खड़े हो गए हैं। ये दो नेता कोई और नहीं बल्कि आसनसोल के सांसद शत्रुघ्न सिन्हा और बर्दवान-दुर्गापुर के सांसद कीर्ति आजाद हैं। कभी भाजपा के कद्दावर चेहरे रहे ये दोनों नेता आज ममता बनर्जी के सबसे वफादार सिपहसालार बनकर उभरे हैं। राजनीति के इस कठिन दौर में जहाँ बंगाली मूल के नेता अपनी राहें जुदा कर रहे हैं, वहीं इन दोनों ‘बाहरी’ कहे जाने वाले नेताओं ने ममता बनर्जी के प्रति अपनी अटूट निष्ठा दिखाई है। ममता बनर्जी ने कभी इन दोनों पर भरोसा जताकर इन्हें बंगाल से संसद भेजा था और कीर्ति आजाद को राष्ट्रीय प्रवक्ता जैसी अहम जिम्मेदारी दी थी, जिसका कर्ज आज ये दोनों नेता पूरी ईमानदारी से चुका रहे हैं।
गद्दारों को कीर्ति की ललकार, ‘शॉटगन’ बोले- मुश्किल वक्त में दीदी को नहीं छोड़ सकता!
पार्टी में मची इस भगदड़ के बीच शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद ने साफ कर दिया है कि वे किसी भी कीमत पर ममता बनर्जी के साथ विश्वासघात नहीं करेंगे। अपने चिरपरिचित अंदाज में ‘शॉटगन’ शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि उनके बारे में बाजार में कई तरह की अफवाहें हैं, लेकिन वे यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि जब वे मुश्किल में थे तब ममता दीदी उनके साथ खड़ी थीं। आज जब दीदी मुश्किल दौर से गुजर रही हैं, तो वे उन्हें अकेला छोड़कर भागने वालों में से नहीं हैं। दूसरी तरफ, कीर्ति आजाद ने तो बागी सांसदों के खिलाफ सीधे मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बागियों को ललकारते हुए कहा कि अगर उनमें दम है तो सांसद पद से इस्तीफा देकर दिखाएं। कीर्ति आजाद लगातार बागी खेमे के सांसदों, जैसे सयोनी घोष आदि से संपर्क कर उन्हें मनाने और ममता के साथ बनाए रखने की हरसंभव कोशिश में जुटे हैं। बिहार के इन दोनों नेताओं की वफादारी ने साबित कर दिया है कि राजनीति में आज भी सिद्धांत और वफादारी जिंदा है।








