आज की सुबह दुनिया के लिए किसी डरावने सपने जैसी रही। जैसे ही वॉशिंगटन से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ “मेजर कॉम्बैट ऑपरेशंस” का बिगुल फूंका, मध्य पूर्व की धरती धमाकों से दहल उठी। इजरायल और अमेरिका की संयुक्त सैन्य शक्ति ने तेहरान के रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया है, जिससे पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया है। सोशल मीडिया पर एक ही चर्चा है— ‘ट्रंप ने अपना असली रंग दिखा दिया है।’ लेकिन इस पूरी जंग में सबसे बड़ा सस्पेंस रूस को लेकर बना हुआ है। क्या रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अपने सबसे भरोसेमंद साथी ईरान को इस तबाही से बचाने के लिए युद्ध के मैदान में उतरेंगे, या फिर यह कूटनीतिक बयानों तक ही सीमित रहेगा?
ट्रंप की ‘विनाशक’ रणनीति और इजरायल का ‘प्रहार’
डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता में वापसी के साथ ही ईरान के प्रति अपनी ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति को धार देनी शुरू कर दी थी, लेकिन 28 फरवरी 2026 की इस सैन्य कार्रवाई ने सबको चौंका दिया है। इजरायल ने इस ऑपरेशन को ‘शील्ड ऑफ जूडा’ का नाम दिया है, जिसके तहत तेहरान के परमाणु केंद्रों और मिसाइल डिपो पर सटीक हमले किए गए हैं। ट्रंप का दावा है कि यह हमला दुनिया को ईरान के ‘परमाणु ब्लैकमेल’ से बचाने के लिए जरूरी था। हालांकि, जमीन पर स्थिति बेहद तनावपूर्ण है; ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई को सुरक्षित स्थान पर ले जाने की खबरें आ रही हैं, और तेहरान की सड़कों पर सायरन की आवाजें गूँज रही हैं। लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह हमला सिर्फ परमाणु ठिकानों तक सीमित रहेगा या इसका उद्देश्य ईरान में सत्ता परिवर्तन करना है?
रूस का कड़ा रुख: पुतिन और मेदवेदेव की ‘आखिरी चेतावनी’
इस हमले के कुछ ही घंटों बाद मॉस्को से जो प्रतिक्रिया आई, उसने वैश्विक तापमान को और बढ़ा दिया है। रूसी सुरक्षा परिषद के उप-प्रमुख दिमित्री मेदवेदेव ने बिना किसी लाग-लपेट के ट्रंप पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उसकी ‘शांति’ सिर्फ एक छलावा है। रूस ने इस हमले को अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन बताया है। रूस और ईरान के बीच हुई ‘व्यापक रणनीतिक साझेदारी’ अब अपनी सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा के दौर में है। पुतिन के लिए ईरान सिर्फ एक सहयोगी नहीं, बल्कि मध्य पूर्व में अमेरिका को रोकने का सबसे मजबूत किला है। अगर यह किला ढहता है, तो रूस का प्रभाव इस क्षेत्र से हमेशा के लिए खत्म हो सकता है।
क्या ईरान के आकाश को ‘रूसी ढाल’ बचा पाएगी?
सवाल यह उठता है कि रूस असल में ईरान की मदद कैसे करेगा? क्या रूसी सुखोई विमान अमेरिकी जेट्स से टकराएंगे? इसकी संभावना कम है, लेकिन रूस पर्दे के पीछे से ईरान को अभेद्य बनाने की पूरी कोशिश कर रहा है। हाल ही में रूस ने ईरान को अत्याधुनिक हवाई रक्षा प्रणालियाँ और रडार तकनीक मुहैया कराई है। रूस के पास मौजूद सैटेलाइट डेटा इस समय ईरान के लिए ‘ब्रह्मास्त्र’ साबित हो सकता है, जिससे वह इजरायली मिसाइलों की लोकेशन का पता लगा सके। इसके अलावा, रूस यूक्रेन युद्ध के अपने अनुभव का इस्तेमाल करते हुए ईरान को ‘ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर’ में मदद कर रहा है। अगर रूस अपनी अत्याधुनिक S-400 या S-500 प्रणाली को पूरी तरह सक्रिय कर देता है, तो अमेरिका और इजरायल के लिए ईरान का आसमान पार करना नामुमकिन हो जाएगा।
वैश्विक बाजार में कोहराम और भारत पर असर
जैसे ही ईरान पर हमले की खबर आई, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में आग लग गई है। अगर हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बंद होता है, तो पूरी दुनिया में तेल की सप्लाई रुक सकती है, जिससे पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छूने लगेंगे। भारत के लिए यह स्थिति दोहरी चुनौती वाली है। एक तरफ लाखों भारतीय मध्य पूर्व में काम करते हैं जिनकी सुरक्षा खतरे में है, वहीं दूसरी तरफ तेल की कीमतों में उछाल भारतीय अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ सकता है। भारत सरकार ने पहले ही एडवाइजरी जारी कर दी है। अब दुनिया की निगाहें पुतिन के अगले कदम पर टिकी हैं— क्या वह सिर्फ बयानबाजी करेंगे या फिर अपनी ‘मिसाइल कूटनीति’ से अमेरिका को पीछे हटने पर मजबूर करेंगे? यह आने वाले कुछ घंटे तय करेंगे कि दुनिया शांति की ओर बढ़ेगी या तीसरे विश्व युद्ध की तबाही की ओर।
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