आम आदमी पार्टी (AAP) के वरिष्ठ नेता राघव चड्ढा के पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने के बाद देश की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। उनके साथ छह अन्य राज्यसभा सांसदों के भी दल बदलने की खबर ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर वंचित बहुजन अघाड़ी के नेता Prakash Ambedkar ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि इस तरह का दलबदल केवल संख्या के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता और इसके पीछे के संवैधानिक पहलुओं को समझना जरूरी है।
‘दो-तिहाई’ नियम पर उठे सवाल
प्रकाश अंबेडकर ने कहा कि राघव चड्ढा और उनके साथियों द्वारा “दो-तिहाई सांसदों के समर्थन” का हवाला देकर इसे वैध विलय बताना पूरी तरह सही नहीं है। उनके अनुसार, संविधान की दसवीं अनुसूची केवल कुछ शर्तों पर विधायकों को अयोग्यता से बचाती है, लेकिन यह किसी राजनीतिक दल के असली विलय को साबित नहीं करती। उन्होंने स्पष्ट किया कि सिर्फ संसद के अंदर संख्या जुटा लेना ही किसी पार्टी के विलय का प्रमाण नहीं होता। इस बयान ने दलबदल विरोधी कानून की सीमाओं पर नई चर्चा को जन्म दे दिया है।
‘विलय’ का असली मतलब क्या है?
अंबेडकर ने आगे कहा कि किसी भी राजनीतिक दल का वास्तविक विलय तभी माना जाएगा जब वह पार्टी के हर स्तर—राष्ट्रीय, राज्य, जिला और स्थानीय इकाइयों—पर लागू हो। उन्होंने जोर देकर कहा कि इसके लिए पार्टी के संविधान के अनुसार निर्णय लिया जाना चाहिए और सभी संगठनात्मक निकायों से मंजूरी मिलनी जरूरी होती है। सिर्फ कुछ सांसदों के फैसले से पूरी पार्टी का विलय नहीं माना जा सकता। उनके मुताबिक, मौजूदा घटनाक्रम ने यह दिखा दिया है कि दलबदल विरोधी कानून के ढांचे पर अब दोबारा विचार करने की जरूरत है।
AAP के लिए बड़ा झटका, आगे क्या होगा?
राघव चड्ढा ने अपने बयान में दावा किया कि राज्यसभा में AAP के दो-तिहाई से अधिक सांसदों ने BJP में शामिल होकर संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया है। उन्होंने बताया कि सात सांसदों ने इस फैसले पर हस्ताक्षर किए हैं और दस्तावेज राज्यसभा के सभापति को सौंप दिया गया है। इस दौरान उन्होंने AAP की आलोचना भी की और केंद्र सरकार की तारीफ की। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है और आने वाले दिनों में इस पर कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बहस और तेज हो सकती है।
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