मिडिल ईस्ट की जंग में पाकिस्तान की ‘सीक्रेट’ एंट्री; अताउल्लाह तरार का वो दावा, जिससे हिल गए अमेरिका और ईरान!

मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) इस वक्त बारूद के ढेर पर बैठा है। इज़रायल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया को दो धड़ों में बांट दिया है। अली लारीजानी की हत्या के बाद आईआरजीसी (IRGC) के जवाबी हमलों ने खाड़ी देशों में खौफ पैदा कर दिया है। इसी बीच, कंगाली की कगार पर खड़े पाकिस्तान ने एक ऐसा दांव खेला है जिसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में हलचल मचा दी है। पाकिस्तान के केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अताउल्लाह तरार ने एक बड़ा बयान देते हुए कहा है कि उनका देश इस भीषण युद्ध को रुकवाने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाने को तैयार है। तरार का दावा है कि पाकिस्तान के ईरान के साथ जो ‘दीर्घकालिक संबंध’ हैं, उनके दम पर वे तेहरान को समझाने और क्षेत्र में शांति बहाली करने की कुव्वत रखते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई में पाकिस्तान की बात को परमाणु शक्ति संपन्न ईरान और ताकतवर अरब देश इतनी गंभीरता से लेंगे?

ईरान को समझाने का ‘पाकिस्तानी प्लान’

अल जजीरा को दिए एक विशेष साक्षात्कार में अताउल्लाह तरार ने साफ तौर पर कहा कि पाकिस्तान क्षेत्र में केवल एक मूकदर्शक बनकर नहीं रहना चाहता। उन्होंने “हार्दिक इच्छा” व्यक्त की है कि पाकिस्तान ईरान में स्थिति को शांत करने और आगे होने वाली अस्थिरता को रोकने में सक्रिय रूप से भाग ले। तरार ने अपनी बात को पुख्ता करते हुए कहा, “मुझे लगता है कि हम इस क्षेत्र के देशों के साथ मध्यस्थता की भूमिका निभाने में सक्षम हैं।” पाकिस्तान का मानना है कि उसके पास सुन्नी बहुल अरब देशों और शिया बहुल ईरान, दोनों के साथ संतुलन बनाए रखने का एक पुराना अनुभव है। हालांकि, कूटनीतिक जानकार इसे पाकिस्तान की एक ऐसी कोशिश के रूप में देख रहे हैं जिसके जरिए वह वैश्विक मंच पर अपनी खोई हुई प्रासंगिकता वापस पाना चाहता है। तरार ने यह भी संकेत दिया कि वे विभिन्न साझेदारों के साथ लगातार बातचीत कर रहे हैं ताकि इस क्षेत्र को और अधिक तबाही से बचाया जा सके।

ईरान का मिसाइल प्रहार और सऊदी की बढ़ती बेचैनी

हाल के दिनों में ईरान ने अपनी जवाबी कार्रवाई का दायरा बढ़ा दिया है। चौंकाने वाली बात यह है कि ईरान के निशाने पर अब सिर्फ इज़रायल और अमेरिका नहीं, बल्कि खाड़ी के दो सबसे प्रभावशाली देश—संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब भी आ गए हैं। ईरान द्वारा इन देशों पर किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों ने रियाद को हिला कर रख दिया है। इसी तनावपूर्ण माहौल के बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाल ही में सऊदी अरब का दौरा किया और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) से मुलाकात की। सूत्रों के अनुसार, इस मुलाकात के दौरान सऊदी अरब ने ईरान के आक्रामक रुख को लेकर अपनी गहरी चिंता जाहिर की थी। सऊदी की इसी सुरक्षा चिंता को दूर करने और खुद को एक ‘शांतिदूत’ के रूप में पेश करने के लिए पाकिस्तान अब ईरान के साथ बातचीत की मेज सजाने की जुगत में लगा है।

 पाकिस्तान का दोहरा संकट

पाकिस्तान के लिए यह मध्यस्थता केवल शांति का मुद्दा नहीं है, बल्कि अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने का भी एक जरिया है। अगर मिडिल ईस्ट में युद्ध बढ़ता है, तो सप्लाई चेन ठप होगी और कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी, जिसका सबसे बुरा असर पाकिस्तान की पहले से ही जर्जर हो चुकी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। अताउल्लाह तरार ने संबंधों में ‘संतुलन’ बनाए रखने पर जोर दिया है, जो पाकिस्तान की विदेश नीति की पुरानी चुनौती रही है। एक तरफ सऊदी अरब है जो पाकिस्तान का सबसे बड़ा आर्थिक मददगार है, और दूसरी तरफ पड़ोसी देश ईरान है जिससे पाकिस्तान को ऊर्जा और सीमा सुरक्षा के मोर्चे पर सहयोग चाहिए। अब देखना यह होगा कि तरार का ‘ईरान को समझाने’ वाला दांव कितना कारगर साबित होता है या फिर यह सिर्फ एक राजनीतिक बयानबाजी बनकर रह जाएगा। पूरी दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या पाकिस्तान वाकई इस भीषण जंग की आग को ठंडा कर पाएगा।

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