पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया विवाद सामने आया है, जिसने तृणमूल कांग्रेस (TMC) की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। विधानसभा में विपक्ष के नेता के चयन से जुड़े कथित फर्जी हस्ताक्षर मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मामला बेहद गंभीर है और इसकी पूरी जांच होनी चाहिए। कोर्ट ने राज्य की जांच एजेंसी को मामले की जांच आगे बढ़ाने और आवश्यक होने पर आरोप पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है। हालांकि, अदालत ने अभिषेक बनर्जी को फिलहाल तीन सप्ताह के लिए गिरफ्तारी से अंतरिम राहत भी दी है। इस फैसले के बाद मामला एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी बहस का केंद्र बन गया है।
जांच एजेंसी ने रखे अपने तर्क
सुनवाई के दौरान जांच एजेंसी ने अदालत को बताया कि इस मामले में पहले ही कई नोटिस जारी किए जा चुके हैं। एजेंसी का कहना है कि उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर मामले की गहन जांच की जा रही है। जांच अधिकारियों ने अदालत को यह भी बताया कि विधानसभा से जुड़े दस्तावेजों की सत्यता की जांच जरूरी है, क्योंकि मामला लोकतांत्रिक प्रक्रिया और विधानसभा की गरिमा से जुड़ा हुआ है। कोर्ट ने भी इस तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि यदि किसी दस्तावेज में हस्ताक्षरों को लेकर विवाद है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है। अदालत ने जांच एजेंसी को कानून के अनुसार कार्रवाई जारी रखने की अनुमति दी है।
अभिषेक बनर्जी ने कोर्ट में क्या कहा?
मामले की सुनवाई के दौरान अभिषेक बनर्जी की ओर से अदालत में कहा गया कि विपक्ष के नेता के चयन का फैसला विधायकों द्वारा लिया गया था और वह केवल पार्टी के संगठनात्मक दायित्वों का निर्वहन कर रहे थे। उनका कहना था कि वह संबंधित बैठक का हिस्सा नहीं थे और पार्टी महासचिव होने के नाते उन्होंने केवल आवश्यक दस्तावेज आगे भेजे थे। हालांकि, सुनवाई के दौरान अदालत ने कुछ सवाल भी उठाए और दस्तावेजों की प्रक्रिया को लेकर जानकारी मांगी। इसके बाद अभिषेक बनर्जी की ओर से जांच में सहयोग करने का आश्वासन दिया गया और गिरफ्तारी से राहत की मांग की गई। अदालत ने उन्हें सीमित अवधि के लिए अंतरिम संरक्षण देते हुए जांच में सहयोग करने का निर्देश दिया।
कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?
यह मामला तब सामने आया जब विधानसभा में विपक्ष के नेता के नाम से जुड़ा एक प्रस्ताव स्पीकर के पास भेजा गया। बाद में कुछ विधायकों ने दावा किया कि प्रस्ताव में दर्ज कुछ हस्ताक्षर उनके नहीं हैं और उन्होंने ऐसे किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। इसके बाद मामले की शिकायत संबंधित अधिकारियों तक पहुंची और जांच शुरू हुई। शिकायत में यह भी कहा गया कि प्रस्ताव से जुड़ी बैठक और दस्तावेजों की तारीखों में अंतर है। इन्हीं आरोपों के आधार पर जांच एजेंसी ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की। अब हाईकोर्ट के निर्देश के बाद इस पूरे मामले की जांच और तेज होने की संभावना है। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट और अदालत की अगली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।
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