रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत और अमेरिका के बीच एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने संकेत दिए हैं कि अमेरिका उन विशेष छूटों और व्यवस्थाओं को खत्म करना चाहता है, जिनकी वजह से भारत समेत कुछ देश रूस से तेल खरीद पा रहे हैं। अमेरिकी सीनेट की एक बैठक के दौरान उन्होंने कहा कि रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों को और प्रभावी बनाने के लिए ऐसी छूटों को समाप्त करना जरूरी है। इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई बहस शुरू हो गई है। हालांकि भारत का रुख पहले की तरह साफ है कि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर ही फैसले लेगा। भारत का मानना है कि ऊर्जा सुरक्षा किसी भी देश की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल होती है और इस मामले में बाहरी दबाव स्वीकार नहीं किया जा सकता।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद कई बार बदला पश्चिमी देशों का रुख
जब वर्ष 2022 में Russian invasion of Ukraine की शुरुआत हुई थी, तब अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे। उस दौरान भारत ने रियायती कीमतों पर रूसी तेल खरीदना जारी रखा। शुरुआत में पश्चिमी देशों ने इस पर सवाल उठाए, लेकिन बाद में कई विशेषज्ञों ने माना कि भारत की खरीदारी से वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता बनी रही। इससे दुनिया भर में तेल की कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिली। कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना था कि अगर भारत और अन्य बड़े खरीदार रूसी तेल खरीदना बंद कर देते, तो वैश्विक बाजार में तेल की भारी कमी और कीमतों में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता था। लेकिन अब अमेरिका का रुख फिर सख्त होता दिखाई दे रहा है, जिससे यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है।
भारत ने दोहराया अपना स्पष्ट संदेश
भारत लगातार यह कहता रहा है कि ऊर्जा खरीद से जुड़े फैसले पूरी तरह राष्ट्रीय जरूरतों के आधार पर लिए जाते हैं। देश की बढ़ती आबादी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को देखते हुए सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। भारतीय नीति विशेषज्ञों का कहना है कि कोई भी संप्रभु देश अपनी आर्थिक और ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखकर ही निर्णय लेता है। इसी वजह से भारत ने हमेशा “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर जोर दिया है। भारत का मानना है कि किसी भी विदेशी शक्ति को यह तय करने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह किस देश से तेल खरीदे या किससे व्यापार करे। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कई बार साफ किया है कि उसकी विदेश नीति और आर्थिक निर्णय राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देकर ही तय किए जाएंगे। यही कारण है कि नई दिल्ली इस मुद्दे पर अपने रुख में कोई बदलाव करने के संकेत नहीं दे रही है।
तेल से आगे बढ़कर अब रणनीतिक स्वतंत्रता की बहस
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल तेल खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता और वैश्विक भूमिका से भी जुड़ा हुआ है। भारत आज दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी भूमिका लगातार मजबूत हो रही है। ऐसे में देश अपनी विदेश नीति को स्वतंत्र रूप से संचालित करना चाहता है। इस बहस में चीन का उदाहरण भी सामने लाया जा रहा है। कई विश्लेषकों का कहना है कि चीन भी रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदता है, लेकिन उसके प्रति पश्चिमी देशों का रवैया अपेक्षाकृत अलग दिखाई देता है। इसी वजह से भारत में दोहरे मानदंडों को लेकर भी चर्चा हो रही है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि अमेरिका रूस पर दबाव बढ़ाने की अपनी नीति को किस तरह आगे बढ़ाता है और भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा तथा रणनीतिक स्वायत्तता के बीच संतुलन कैसे बनाए रखता है। फिलहाल भारत का संदेश स्पष्ट है कि देश अपने हितों के अनुसार ही फैसले लेगा।








