UP: उत्तर प्रदेश में पुलिसिया रौब और ‘शांति भंग’ की धाराओं के नाम पर आम जनता को डराने वाले अधिकारियों के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐसी नजीर पेश की है, जिससे पूरे महकमे में हड़कंप मच गया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि खाकी की आड़ में किसी भी बेगुनाह की आजादी को छीना नहीं जा सकता। अक्सर देखा जाता है कि पुलिस मामूली विवाद में भी लोगों को शांति भंग की आशंका में जेल की सलाखों के पीछे भेज देती है, लेकिन इस बार हाईकोर्ट का डंडा ऐसा चला है कि सीधे दोषी पुलिस अधिकारी की जेब पर ही भारी चोट पड़ी है। अदालत ने साफ कहा कि अगर बिना ठोस कानूनी प्रक्रिया के किसी को जेल भेजा, तो उसका खामियाजा अधिकारी को अपनी खुद की सैलरी से भुगतना होगा।
क्या है पूरा मामला और क्यों भड़का हाईकोर्ट का गुस्सा?
यह पूरा मामला संगम नगरी प्रयागराज के खीरी थाना क्षेत्र का है, जहाँ मंसूर अहमद उर्फ लल्लू नाम के एक व्यक्ति को पुलिस ने हिरासत में लिया था। पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली का फायदा उठाते हुए संबंधित सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) ने बिना किसी पुख्ता कानूनी जांच-पड़ताल और वैधानिक प्रक्रिया के, महज़ एक छपे-छपाए कागज (मुद्रित प्रोफार्मा) पर दस्तखत करके पीड़ित को सीधे जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया। पीड़ित की तरफ से इस तानाशाही के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका दायर की गई। जब कोर्ट ने मामले की फाइलें खंगालीं, तो पुलिस की बड़ी लापरवाही और अधिकारों का दुरुपयोग खुलकर सामने आ गया।
8 दिनों की अवैध हिरासत और ₹2 लाख का भारी जुर्माना
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इस पर बेहद सख्त रुख अपनाया। हाईकोर्ट ने पाया कि मंसूर अहमद को पूरे 8 दिनों तक जेल में रखना पूरी तरह से गैरकानूनी और उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन था। कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया है कि वह पीड़ित व्यक्ति को मानसिक और सामाजिक प्रताड़ना के एवज में ₹2 लाख का हर्जाना दे। लेकिन इस कहानी में असली ट्विस्ट इसके बाद आया, जिसने कानून का दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों की नींद उड़ा दी है।
अधिकारी की जेब से होगी वसूली, पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली को सख्त संदेश
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में जो सबसे बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया, वह यह है कि पीड़ित को मिलने वाले ₹2 लाख के मुआवजे में से ₹25,000 की राशि सीधे दोषी तत्कालीन सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) के वेतन से काटी जाएगी। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि सरकारी खजाने पर इसका पूरा बोझ नहीं डाला जा सकता, क्योंकि गलती किसी व्यवस्था की नहीं बल्कि कुर्सी पर बैठे अधिकारी की सनक की थी। कानूनी जानकारों का मानना है कि पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू होने के बाद मजिस्ट्रेट की शक्तियां पुलिस अफसरों को मिलने से इसके दुरुपयोग की शिकायतें बढ़ रही थीं, जिस पर हाईकोर्ट का यह फैसला एक बेहद जरूरी और युगांतकारी ब्रेक साबित होगा।
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