देश में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर एक बार फिर सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। पश्चिम बंगाल से शुरू हुआ यह विवाद अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में तूफान खड़ा कर रहा है। समाजवादी पार्टी के संभल से सांसद जियाउर्रहमान बर्क द्वारा वंदे मातरम को लेकर दिए गए एक बयान पर अब कांग्रेस के पूर्व नेता और प्रखर वक्ता आचार्य प्रमोद कृष्णम ने बेहद तीखा पलटवार किया है। प्रमोद कृष्णम के इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है और सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर नई बहस छिड़ गई है।
आखिर क्यों सांसद बर्क पर भड़के आचार्य प्रमोद कृष्णम?
दरअसल, इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब पश्चिम बंगाल में मदरसों के अंदर सुबह की प्रार्थना में ‘वंदे मातरम’ गाना अनिवार्य कर दिया गया। इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने इसका विरोध किया था। बर्क के इसी स्टैंड पर आचार्य प्रमोद कृष्णम ने उन पर सीधा और तीखा हमला बोला। आचार्य ने साफ शब्दों में कहा कि संभल के सांसद का दिल हमेशा भारत के लिए नहीं, बल्कि पाकिस्तान, तालिबान और बांग्लादेश के लिए धड़कता है। उन्होंने आगे कहा कि जिस व्यक्ति का दिल पड़ोसी मुल्क के लिए धड़कता हो, वह कभी भी ‘वंदे मातरम’ का सम्मान नहीं कर सकता और न ही उसे गा सकता है।
‘जबरदस्ती देशभक्ति साबित नहीं की जा सकती’ – जियाउर्रहमान बर्क
दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने अपने बयान को सही ठहराते हुए सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। बर्क का कहना है कि किसी को भी जबरदस्ती कोई खास शब्द बोलने के लिए मजबूर करके देशभक्ति साबित नहीं कराई जा सकती। उन्होंने दलील दी कि देश का हर मुस्लिम नागरिक भारत के प्रति वफादार है और उन्हें किसी के सामने अपनी वफादारी का प्रमाण देने की जरूरत नहीं है। बर्क के मुताबिक, राष्ट्रगान (जन गण मन) का सभी धर्मों के लोग पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन राष्ट्रगीत (वंदे मातरम) के कुछ शब्दों पर संविधान सभा के समय से ही मतभेद रहे हैं। उन्हें देश से नहीं, बल्कि गीत की कुछ पंक्तियों से आपत्ति है।
क्या है इस पूरे ‘वंदे मातरम’ विवाद की असली वजह?
इस सियासी घमासान की मुख्य जड़ पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री और प्रशासन द्वारा लिया गया एक नया फैसला है, जिसमें राज्य के सभी मदरसों के लिए ‘वंदे मातरम’ को अनिवार्य कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश सरकार भी लगातार शैक्षणिक संस्थानों में राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान को लेकर कड़े कदम उठा रही है। इसी आदेश के बाद विपक्ष और सत्तापक्ष आमने-सामने आ गए हैं। जहां एक पक्ष इसे राष्ट्रीय एकता और अनुशासन से जोड़कर देख रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत पसंद पर हमला बता रहा है। अब देखना यह होगा कि बर्क और आचार्य प्रमोद कृष्णम के बीच शुरू हुई यह जुबानी जंग आने वाले दिनों में क्या नया मोड़ लेती है।
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