प्रयागराज से सामने आए एक अहम फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल किसी को उसकी जाति से संबोधित करना अपने आप में एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं माना जाएगा, जब तक कि उसमें अपमान या उत्पीड़न की स्पष्ट मंशा न हो। न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि कानून का दुरुपयोग रोकना भी न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी है। कोर्ट ने पाया कि प्रस्तुत मामले में ऐसे कोई ठोस साक्ष्य नहीं हैं जो यह साबित करें कि आरोपी ने जानबूझकर जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल अपमानित करने के लिए किया था। इस आधार पर कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया, हालांकि अन्य आरोपों को बरकरार रखा गया।
एफआईआर और जांच पर उठे सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने दलील दी कि प्रारंभिक एफआईआर अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज की गई थी और उसमें कहीं भी जाति आधारित अपमान का जिक्र नहीं था। बाद में, सीआरपीसी की धारा 161 के तहत दिए गए बयानों में यह आरोप जोड़ा गया कि शादी समारोह के दौरान जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया गया। कोर्ट ने इस बदलाव पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि अगर शुरुआत में ऐसा कोई आरोप नहीं था, तो बाद में इसे जोड़ना संदेह पैदा करता है। साथ ही, मेडिकल रिपोर्ट भी अभियोजन के दावों का समर्थन नहीं कर रही थी, जिससे केस की विश्वसनीयता और कमजोर हो गई।
अभियोजन की दलील और कोर्ट की प्रतिक्रिया
सरकारी वकील ने कोर्ट में यह तर्क दिया कि पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल करने के बाद विशेष अदालत ने संज्ञान लिया है और सम्मन जारी किया है, इसलिए मामला विचारणीय है। लेकिन कोर्ट ने इस दलील को पर्याप्त नहीं माना और कहा कि केवल चार्जशीट दाखिल होना अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं होता। न्यायालय ने कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में यह आवश्यक है कि प्रथम दृष्टया ऐसे साक्ष्य हों, जो अपराध के सभी आवश्यक तत्वों को दर्शाते हों। इस मामले में जाति के आधार पर अपमान की मंशा साबित नहीं हो सकी, जिससे एससी/एसटी एक्ट लागू करने का आधार कमजोर पड़ गया।
चरित्र प्रमाण पत्र पर भी मिला राहत का आदेश
इस मामले का एक अन्य पहलू भी सामने आया, जिसमें याचिकाकर्ता ने अपने चरित्र प्रमाण पत्र के आवेदन को खारिज किए जाने को चुनौती दी थी। प्रशासन ने यह कहते हुए आवेदन निरस्त कर दिया था कि याची के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित है। सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से बताया गया कि 9 अप्रैल 2026 को एक नया शासनादेश जारी किया गया है, जो एक अन्य केस के फैसले के अनुपालन में लाया गया है। इस पर कोर्ट ने निर्देश दिया कि नए शासनादेश के आधार पर याची को चरित्र प्रमाण पत्र जारी किया जाए। साथ ही, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश की प्रमाणित प्रति जमा करने के बाद दो सप्ताह के भीतर प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इस फैसले को कानून के दुरुपयोग पर लगाम और निष्पक्ष न्याय की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
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