Women’s Reservation Bill: संसद के विशेष सत्र में पेश किए गए महिला आरक्षण विधेयक ने देश की राजनीति को एक बार फिर गरमा दिया है। जहां केंद्र सरकार इसे महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसके कई पहलुओं पर सवाल उठा रहा है। शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने इस बिल को लेकर केंद्र सरकार की मंशा पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण के नाम पर सरकार कुछ और ही राजनीतिक रणनीति लागू करना चाहती है। राउत के मुताबिक, इस बिल के साथ परिसीमन जैसे मुद्दों को जोड़कर सरकार अपने फायदे के लिए माहौल बना रही है, जिसका उनकी पार्टी विरोध करेगी।
संजय राउत का बड़ा बयान
संजय राउत ने साफ किया कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण के सिद्धांत के खिलाफ नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि 2023 में जब यह बिल पहली बार सामने आया था, तब भी उन्होंने इसका समर्थन किया था। लेकिन अब जिस तरह से इसे नए रूप में पेश किया जा रहा है, उस पर उन्हें आपत्ति है। राउत ने कहा कि अगर महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देना है, तो मौजूदा लोकसभा की 543 सीटों के आधार पर ही इसे लागू किया जा सकता है। सीटों की संख्या बढ़ाने या नए परिसीमन की जरूरत नहीं है। उनका मानना है कि इस प्रक्रिया के पीछे सरकार का मकसद राजनीतिक समीकरण बदलना हो सकता है, जिससे चुनावी फायदा उठाया जा सके।
‘नारी शक्ति बिल नहीं, भाजपा शक्ति बिल’—राउत का बड़ा आरोप
अपने बयान में संजय राउत ने सबसे तीखा हमला करते हुए कहा कि यह ‘नारी शक्ति बिल’ नहीं बल्कि ‘भाजपा शक्ति बिल’ है। उन्होंने आरोप लगाया कि अगर लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ाई जाती है, तो यह सीधे तौर पर राजनीतिक गणित को बदलने की कोशिश होगी। राउत ने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर लोकसभा की सीटें 800 तक पहुंचाई जाती हैं और राज्यों में भी सीटों का विस्तार होता है, तो इसका असर चुनावी नतीजों पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि अगर सरकार वास्तव में महिलाओं को सशक्त बनाना चाहती है, तो उसे मौजूदा ढांचे में ही आरक्षण लागू करना चाहिए। साथ ही उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से अपील की कि उनके सांसद इस मुद्दे पर संसद में सरकार के खिलाफ वोट करें।
विपक्ष की एकजुटता और आगे की सियासत
महिला आरक्षण विधेयक को लेकर विपक्ष अब एकजुट नजर आ रहा है। हाल ही में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर हुई बैठक में कई बड़े नेता शामिल हुए, जिनमें राहुल गांधी भी मौजूद थे। वहीं, उद्धव ठाकरे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़े। इस बैठक में सभी दलों ने महिला आरक्षण के समर्थन के साथ-साथ सरकार की नीतियों का विरोध करने की रणनीति बनाई। अब साफ संकेत मिल रहे हैं कि संसद का यह सत्र काफी हंगामेदार रहने वाला है। एक तरफ सरकार इसे ऐतिहासिक सुधार बता रही है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक चाल के रूप में पेश कर रहा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और ज्यादा गरमा सकता है, और इसका असर देश की राजनीति पर भी देखने को मिल सकता है।
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