डिजिटल दुनिया में बढ़ते साइबर अपराधों ने अब आम लोगों के साथ-साथ वरिष्ठ नागरिकों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया है। ऐसा ही एक चौंकाने वाला मामला सामने आया, जहां सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता सुखमंदर सिंह को ठगों ने बेहद सुनियोजित तरीके से अपने जाल में फंसा लिया। ठगों ने खुद को पुलिस, आरबीआई और अन्य सरकारी अधिकारियों के रूप में पेश किया और उन्हें ‘डिजिटल अरेस्ट’ का डर दिखाया। वीडियो कॉल के जरिए लगातार निगरानी में रखते हुए उन्हें मानसिक रूप से इतना दबाव में ला दिया गया कि उन्होंने खुद ही अपने बैंक खाते से करोड़ों रुपये ट्रांसफर कर दिए। यह घटना न सिर्फ चौंकाने वाली है, बल्कि यह भी दिखाती है कि साइबर अपराधी किस हद तक तकनीक और मनोवैज्ञानिक दबाव का इस्तेमाल कर रहे हैं।
हाई कोर्ट का सख्त रुख: CBI को सौंपी गई जांच
इस गंभीर मामले को देखते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस जसजीत सिंह बेदी की पीठ ने साफ कहा कि ऐसे संगठित और बहु-राज्यीय साइबर अपराधों की जांच स्थानीय स्तर पर नहीं, बल्कि उच्च तकनीकी विशेषज्ञता वाली एजेंसी ही कर सकती है। इसी कारण कोर्ट ने इस पूरे मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपने का आदेश दिया। अदालत का मानना है कि डिजिटल अरेस्ट जैसे नए तरीकों से हो रही ठगी को रोकने के लिए हाई-टेक जांच और समन्वित कार्रवाई बेहद जरूरी है। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों पर कड़ी निगरानी और तेजी से कार्रवाई का संकेत भी देता है।
ठगी का पूरा खेल: कैसे निकाले गए 2.07 करोड़ रुपये
जांच के दौरान सामने आया कि यह ठगी 9 मई से 16 जून 2025 के बीच हुई। इस दौरान ठगों ने पीड़ित के पेंशन खाते से आरटीजीएस के जरिए कई ट्रांजैक्शन करवाए और कुल 2.07 करोड़ रुपये अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कर लिए। ठगों ने फर्जी दस्तावेज, नकली आरबीआई नोटिस और डिजिटल अरेस्ट वारंट का सहारा लिया। इतना ही नहीं, उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाने की धमकी देकर पीड़ित को डराया और उसे वीडियो कॉल पर लगातार ‘निगरानी’ में रखा। इस तरह का मनोवैज्ञानिक दबाव इतना प्रभावी रहा कि पीड़ित को लंबे समय तक यह समझ ही नहीं आया कि वह एक बड़े साइबर फ्रॉड का शिकार हो चुका है।
साइबर अपराध का नया खतरा: आम लोगों के लिए चेतावनी
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की ठगी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज के लिए एक बड़ी चेतावनी है। डिजिटल अरेस्ट जैसे नए तरीकों से अपराधी लोगों को डराकर पैसे ऐंठ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कोई भी सरकारी एजेंसी कभी भी वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी या जांच नहीं करती और न ही पैसे ट्रांसफर करने के लिए कहती है। ऐसे में अगर कोई व्यक्ति खुद को पुलिस या सरकारी अधिकारी बताकर इस तरह का दबाव बनाए, तो तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए। सरकार और एजेंसियां भी अब ऐसे मामलों को गंभीरता से लेते हुए जागरूकता बढ़ाने पर जोर दे रही हैं, ताकि लोग इस तरह के जाल में फंसने से बच सकें।








