प्रयागराज में शंकराचार्य से जुड़े विवाद ने अब बेहद गंभीर रूप ले लिया है। दो बटुकों द्वारा लगाए गए आरोपों ने पूरे मामले को नई दिशा दे दी है। उन्होंने दावा किया कि आश्रम में ‘गुरु दीक्षा’ के नाम पर उन्हें एक प्रक्रिया से गुजरने को कहा जाता था और बाद में उनके साथ गलत व्यवहार होता था। यह बयान सामने आने के बाद धार्मिक और सामाजिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। मामला पहले से दर्ज केस से जुड़ा है, जिसमें Swami Avimukteshwaranand का नाम सामने आया है। हालांकि, आरोपों की सच्चाई अभी जांच के दायरे में है और अदालत में अंतिम फैसला होना बाकी है।
बटुकों का खुलासा
इंटरव्यू में दो बटुकों ने विस्तार से अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें पहले धार्मिक शिक्षा और विशेष अनुष्ठान के नाम पर तैयार किया जाता था। इसके बाद उन्हें स्वामी के सामने पेश किया जाता और फिर कथित रूप से अनुचित हरकतें होती थीं।
बटुकों का कहना है कि वे काफी समय तक मानसिक दबाव में रहे। उन्होंने दावा किया कि विरोध करने पर उन्हें आश्रम से बाहर निकालने या बदनाम करने की धमकी दी जाती थी। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हुई है। पुलिस का कहना है कि इंटरव्यू में सामने आए बयानों को भी जांच का हिस्सा बनाया जाएगा।
पहले से दर्ज है मामला, जांच तेज
इस पूरे प्रकरण में प्रयागराज के झूंसी थाने में पहले ही मामला दर्ज किया जा चुका है। मामला बाल संरक्षण से जुड़े सख्त कानूनों के तहत दर्ज हुआ है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, पीड़ितों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं और सभी तथ्यों की बारीकी से जांच की जा रही है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से पहले भी इन आरोपों को सिरे से खारिज किया गया है। उनके समर्थकों का कहना है कि यह धार्मिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की साजिश है। दूसरी ओर, शिकायतकर्ताओं का कहना है कि उन्हें न्याय चाहिए और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। फिलहाल, पुलिस साक्ष्य जुटाने और गवाहों से पूछताछ की प्रक्रिया में लगी है।
धार्मिक और सामाजिक हलकों में बढ़ी हलचल
मामले के सामने आने के बाद प्रयागराज और आसपास के इलाकों में चर्चा तेज हो गई है। कुछ धार्मिक संगठनों ने निष्पक्ष जांच की मांग की है, जबकि कुछ ने इसे संस्थान की छवि धूमिल करने का प्रयास बताया है। प्रशासन ने शांति बनाए रखने की अपील की है और कहा है कि कानून अपना काम करेगा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में अदालत साक्ष्यों और जांच रिपोर्ट के आधार पर ही फैसला करती है। अभी तक जो भी आरोप सामने आए हैं, वे जांच के अधीन हैं। जब तक अदालत का निर्णय नहीं आता, किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
यह मामला अब केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि धार्मिक संस्थाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी सवाल खड़े कर रहा है। आने वाले दिनों में जांच और अदालत की कार्यवाही इस विवाद की दिशा तय करेगी।








