Thursday, February 26, 2026

25 साल बाद क्यों बंद करना पड़ा भारत को अपना इकलौता विदेशी सैन्य ठिकाना? करोड़ों डॉलर खर्च के बाद भी क्या बदल गई रणनीति?

भारत ने करीब पच्चीस साल तक जिस विदेशी सैन्य ठिकाने का इस्तेमाल किया, वह मध्य एशिया के देश ताजिकिस्तान में स्थित था। इस एयरबेस का नाम आयनी एयरबेस है, जो राजधानी दुशांबे के पास मौजूद है। यह भारत का एकमात्र विदेशी सैन्य ठिकाना माना जाता था, जहां भारतीय उपस्थिति लंबे समय तक बनी रही।

यह एयरबेस मूल रूप से सोवियत काल में विकसित किया गया था, लेकिन बाद में भारत ने इसमें निवेश कर इसे आधुनिक रूप देने में सहयोग किया। भारत की दिलचस्पी इस क्षेत्र में इसलिए भी थी क्योंकि यह अफगानिस्तान, पाकिस्तान और चीन के निकट पड़ता है। मध्य एशिया में रणनीतिक मौजूदगी भारत की सुरक्षा और विदेश नीति दोनों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती रही है।

हालांकि यह पूरी तरह से भारतीय नियंत्रण वाला सैन्य अड्डा नहीं था, फिर भी यहां भारतीय वायुसेना की तकनीकी और लॉजिस्टिक उपस्थिति बनी रही। लीज समझौते की अवधि समाप्त होने के बाद इसे आगे नहीं बढ़ाया गया और भारत को अपनी सक्रिय मौजूदगी समेटनी पड़ी।

कितना हुआ था खर्च और क्या-क्या किया गया विकास?

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस एयरबेस के विकास और आधुनिकीकरण पर भारत ने लगभग 10 करोड़ डॉलर (करीब सैकड़ों करोड़ रुपये) खर्च किए थे। यह निवेश एक साथ नहीं, बल्कि कई वर्षों में चरणबद्ध तरीके से किया गया।

भारत ने यहां रनवे को मजबूत और लंबा कराया ताकि लड़ाकू विमान और बड़े सैन्य विमान सुरक्षित रूप से उतर सकें। इसके अलावा ईंधन भंडारण सुविधा, एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम, संचार व्यवस्था और बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाया गया। इस काम में भारतीय वायुसेना के विशेषज्ञों के साथ सीमा सड़क संगठन (BRO) की भी भूमिका बताई जाती है।

इस ठिकाने का उपयोग मुख्य रूप से लॉजिस्टिक सपोर्ट और क्षेत्रीय निगरानी के लिहाज से किया जाता था। यहां हेलिकॉप्टरों की सीमित तैनाती और तकनीकी रखरखाव की व्यवस्था मौजूद थी। हालांकि यह भारत का पूर्ण विकसित विदेशी सैन्य अड्डा नहीं था, फिर भी इसकी सामरिक अहमियत को देखते हुए इसे एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता था।

क्यों था आयनी एयरबेस रणनीतिक रूप से अहम?

आयनी एयरबेस का भौगोलिक स्थान इसे खास बनाता था। यह अफगानिस्तान की सीमा के करीब है और पाकिस्तान तथा चीन से भी बहुत दूर नहीं पड़ता। ऐसे में इस क्षेत्र में भारत की मौजूदगी को रणनीतिक संतुलन के तौर पर देखा जाता था।

रक्षा विश्लेषकों का मानना था कि इस ठिकाने के जरिए भारत को मध्य एशिया में एक स्थायी उपस्थिति मिलती थी। अफगानिस्तान में बदलती परिस्थितियों पर नजर रखने और क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य को समझने में यह मददगार हो सकता था। जरूरत पड़ने पर मानवीय सहायता या आपातकालीन अभियानों के लिए भी यह स्थान उपयोगी माना जाता था।

हालांकि, 2021 के बाद अफगानिस्तान की राजनीतिक स्थिति में बड़े बदलाव आए। क्षेत्रीय समीकरण बदलने के साथ इस एयरबेस की उपयोगिता पर भी नए सिरे से विचार किया गया। कुछ रिपोर्टों में यह भी संकेत मिले कि क्षेत्रीय शक्तियों के बढ़ते प्रभाव और बदलती कूटनीतिक प्राथमिकताओं के कारण भारत ने अपनी रणनीति में संशोधन किया।

आखिर क्यों खाली करना पड़ा यह ठिकाना?

सरकारी सूत्रों के अनुसार, लीज समझौते की अवधि पूरी होने के बाद उसका नवीनीकरण नहीं किया गया। आधिकारिक तौर पर यही वजह बताई गई कि तय समय समाप्त होने पर समझौता आगे नहीं बढ़ाया गया।

हालांकि, अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों का मानना है कि क्षेत्र में रूस और चीन की सक्रियता बढ़ने के बाद परिस्थितियां जटिल हो गई थीं। चीन ने मध्य एशिया में अपनी आर्थिक और सुरक्षा मौजूदगी मजबूत की है, जबकि रूस पारंपरिक रूप से इस क्षेत्र में प्रभाव रखता है। ऐसे में भारत की सैन्य उपस्थिति को लेकर भू-राजनीतिक संतुलन भी एक महत्वपूर्ण कारक रहा हो सकता है।

भारत ने इस मुद्दे पर कोई आक्रामक बयान नहीं दिया और चुपचाप अपनी उपस्थिति सीमित कर ली। इससे यह संकेत मिलता है कि विदेश नीति और रक्षा रणनीति में समय-समय पर व्यावहारिक बदलाव किए जाते हैं। अब सवाल यह है कि क्या भविष्य में भारत किसी अन्य देश में ऐसा सैन्य सहयोग विकसित करेगा या फिर अपनी रणनीति को अलग दिशा देगा। फिलहाल इतना तय है कि 25 साल बाद भारत का इकलौता विदेशी सैन्य ठिकाना इतिहास का हिस्सा बन गया है।

 

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