भारत खरीदता रहा रूसी तेल, दोस्ती के बाद भी रूस बढ़ाता रहा दाम! सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े

भारत और रूस के बीच ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग लगातार मजबूत बना हुआ है। मई 2026 में भारत ने रूस से रिकॉर्ड मात्रा में कच्चे तेल की खरीद की, जिससे रूस एक बार फिर देश का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक रही, जो पिछले करीब दो वर्षों में सबसे ज्यादा मानी जा रही है। हालांकि इस बार स्थिति पहले जैसी नहीं रही। यूक्रेन युद्ध के बाद जिस रूसी तेल को भारत भारी छूट पर खरीद रहा था, अब उसी तेल के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। इसके बावजूद भारतीय कंपनियों ने रूस से खरीद कम नहीं की, जिससे इस फैसले को लेकर कई सवाल भी उठने लगे हैं।

बढ़ी कीमतों ने बढ़ाया आयात खर्च

मई 2026 में भारत ने बड़ी मात्रा में तेल आयात किया, लेकिन इसके साथ ही देश का आयात बिल भी काफी बढ़ गया। आंकड़ों से पता चलता है कि कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर भारत पर पड़ा है। खास बात यह रही कि रूस से मिलने वाला तेल इस बार कई अन्य देशों की तुलना में महंगा रहा। जहां कुछ देशों ने भारत को अपेक्षाकृत कम कीमत पर तेल उपलब्ध कराया, वहीं रूस ने ऊंची दर पर आपूर्ति की। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक बाजार में मांग, आपूर्ति और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण रूस ने अपनी कीमतें बढ़ाई हैं। नतीजतन, भारत को पहले की तुलना में ज्यादा भुगतान करना पड़ा, जिससे कुल आयात लागत में भी बड़ा इजाफा देखने को मिला।

 महंगा होने के बावजूद क्यों जारी है खरीदारी?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब रूसी तेल पहले से महंगा हो चुका है तो भारत उसकी खरीद जारी क्यों रखे हुए है। ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई व्यावहारिक कारण हैं। भारतीय रिफाइनरियां पिछले कुछ वर्षों में रूसी कच्चे तेल के अनुसार अपनी प्रक्रियाओं को ढाल चुकी हैं। यदि अचानक किसी अन्य देश के तेल पर पूरी तरह निर्भर होना पड़े तो तकनीकी बदलावों में समय और भारी निवेश की जरूरत होगी। इसके अलावा रूस लगातार बड़ी मात्रा में तेल उपलब्ध करा रहा है, जिससे आपूर्ति की स्थिरता बनी रहती है। यही वजह है कि कीमत बढ़ने के बावजूद भारतीय कंपनियां रूसी तेल को एक भरोसेमंद विकल्प मान रही हैं।

आगे क्या होगा भारत की तेल रणनीति?

ऊर्जा बाजार के जानकारों का मानना है कि आने वाले महीनों में भारत अपनी तेल खरीद नीति को और अधिक संतुलित बनाने की कोशिश कर सकता है। हाल के समय में भारत ने ईरान, वेनेजुएला और अन्य देशों से भी तेल आयात बढ़ाने के संकेत दिए हैं। इससे किसी एक देश पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि फिलहाल रूस की भूमिका भारतीय ऊर्जा सुरक्षा में बेहद महत्वपूर्ण बनी हुई है। भारत की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि देश में तेल की आपूर्ति प्रभावित न हो और उद्योगों तथा आम लोगों की जरूरतें लगातार पूरी होती रहें। ऐसे में भले ही रूसी तेल की कीमत बढ़ गई हो, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा और रिफाइनरी संचालन की जरूरतों को देखते हुए रूस अभी भी भारत के लिए एक अहम साझेदार बना हुआ है।

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