क्या सच में मान गया अमेरिका? ईरान की एक शर्त से बदल सकता है खेल, हॉर्मुज पर खुल सकता है बड़ा रास्ता!

ईरान-अमेरिका शांति वार्ता: अमेरिका और ईरान के बीच लंबे तनाव के बाद अब एक नई कूटनीतिक हलचल देखने को मिल रही है। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में दोनों देशों के वरिष्ठ प्रतिनिधिमंडल मौजूद हैं, जहां संभावित शांति वार्ता को लेकर माहौल बन रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका ने ईरान की एक अहम शर्त मान ली है, जिससे बातचीत का रास्ता साफ हो सकता है। यह शर्त है—विदेशों में जमा ईरान की संपत्तियों को रिलीज करना। खासतौर पर कतर और अन्य देशों के बैंकों में फंसी ईरानी संपत्ति को लेकर अमेरिका का रुख नरम पड़ता दिख रहा है। इसे ईरान ने सकारात्मक संकेत माना है और इसे बातचीत की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है।

ईरान की शर्त और हॉर्मुज का कनेक्शन

ईरान लंबे समय से आर्थिक प्रतिबंधों के कारण दबाव में है और वह चाहता है कि उसकी विदेशों में फंसी संपत्ति वापस मिले। यही उसकी मुख्य शर्त रही है। अगर यह शर्त पूरी होती है और आगे चलकर प्रतिबंधों में ढील मिलती है, तो इसका असर सीधे हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर भी पड़ सकता है। यह वही रणनीतिक समुद्री मार्ग है, जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है। ईरान इस पर अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है और युद्ध में हुए नुकसान के मुआवजे की भी मांग कर रहा है। ऐसे में अगर बातचीत सफल होती है, तो हॉर्मुज में तनाव कम हो सकता है और वैश्विक तेल सप्लाई सामान्य होने की उम्मीद बढ़ जाएगी।

कौन-कौन शामिल, क्यों अहम है यह बातचीत

इस वार्ता में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व जेडी वेंस कर रहे हैं, जबकि उनके साथ डोनाल्ड ट्रंप के करीबी माने जाने वाले जैरेड कुशनर और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ भी मौजूद हैं। वहीं ईरान की ओर से संसद स्पीकर मोहम्मद बाकिर कालिबफ और विदेश मंत्री अब्बास अराकची बातचीत की कमान संभाल रहे हैं। खास बात यह है कि 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद यह दोनों देशों के बीच सबसे उच्च-स्तरीय आमना-सामना हो सकता है। अगर सीधी बातचीत होती है, तो यह 2015 के परमाणु समझौते के बाद पहली बड़ी कूटनीतिक पहल होगी, जिसे बाद में ट्रंप प्रशासन ने खत्म कर दिया था।

 बयानबाजी तेज, लेकिन उम्मीदें भी बरकरार

जहां एक ओर बातचीत की उम्मीद बढ़ी है, वहीं बयानबाजी भी तेज हो गई है। डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा कि ईरान के पास बातचीत के अलावा कोई विकल्प नहीं है। दूसरी ओर ईरान ने साफ कर दिया है कि जब तक उसकी शर्तें पूरी नहीं होतीं, तब तक बातचीत आगे नहीं बढ़ेगी। पाकिस्तान इस पूरे मामले में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है और शुरुआती प्रतिक्रियाएं साझा कर रहा है। अगर दोनों पक्ष एक-दूसरे के प्रस्तावों पर सहमत हो जाते हैं, तो यह न सिर्फ क्षेत्रीय तनाव को कम करेगा बल्कि वैश्विक स्तर पर भी बड़ा असर डालेगा। खासकर हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर स्थिति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

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