होर्मुज बंद हुआ तो क्या भारत में मच जाएगा हाहाकार? पेट्रोल से लेकर रसोई तक हर चीज पर पड़ सकता है असर

पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। हालात ऐसे बन गए हैं कि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर चर्चा तेज हो गई है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और गैस दूसरे देशों तक पहुंचती है। व्यापारिक संगठनों का कहना है कि अगर इस रास्ते पर लंबे समय तक असर पड़ता है तो कई देशों के सामने ऊर्जा संकट खड़ा हो सकता है। भारत भी उन देशों में शामिल है जो खाड़ी देशों से बड़ी मात्रा में तेल खरीदते हैं।

भारत को लग सकता है बड़ा झटका 

भारत अपनी जरूरत का काफी कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है और उसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। यदि होर्मुज का रास्ता प्रभावित होता है तो तेल की सप्लाई पर असर पड़ सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। तेल महंगा होने का सीधा असर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों पर पड़ सकता है। हालांकि कीमतें कितनी बढ़ेंगी, यह पूरी तरह हालात और सरकारी नीतियों पर निर्भर करेगा, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि लंबे समय तक संकट रहने पर आम लोगों की जेब पर बोझ बढ़ सकता है।

महंगाई बढ़ी तो रोजमर्रा की चीजें भी हो सकती हैं महंगी

तेल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ वाहनों तक सीमित नहीं रहता। ट्रांसपोर्ट महंगा होने पर खाने-पीने की चीजों से लेकर कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक सामान और अन्य जरूरत की वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ सकती हैं। उद्योगों को कच्चा माल महंगा मिलेगा तो उत्पादन लागत बढ़ेगी। हवाई यात्रा का खर्च भी बढ़ सकता है क्योंकि विमान ईंधन की कीमतों पर असर पड़ेगा। व्यापार से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि यह संकट लंबे समय तक चलता है तो देश में महंगाई का दबाव बढ़ सकता है और आम परिवारों का बजट प्रभावित हो सकता है।

क्या भारत के पास इस संकट से बचने का रास्ता है?

भारत के पास कुछ ऐसे विकल्प हैं जो मुश्किल समय में मदद कर सकते हैं। देश के पास रणनीतिक तेल भंडार मौजूद हैं, जिनका उपयोग आपात स्थिति में किया जा सकता है। इसके अलावा भारत रूस समेत कई अन्य देशों से भी तेल खरीद रहा है, जिससे पूरी निर्भरता खाड़ी देशों पर नहीं है। जरूरत पड़ने पर अमेरिका, ब्राजील और अन्य देशों से भी तेल मंगाया जा सकता है, हालांकि इसमें ज्यादा समय और खर्च लगेगा। फिलहाल सरकार और तेल कंपनियां हालात पर नजर बनाए हुए हैं। आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की स्थिति ही तय करेगी कि इसका असर भारत पर कितना पड़ता है।

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