सॉफ्टवेयर इंजीनियर से सुप्रीम कोर्ट के टारगेट तक: कौन है प्रबल यादव और कैसे एक मुस्लिम युवती के कारण गई उसकी नौकरी?

देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को तार-तार करने वाली एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने पूरे कानूनी गलियारे को हिलाकर रख दिया है। अमूमन शांत रहने वाले कोर्ट रूम में उस वक्त हड़कंप मच गया जब जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस आलोक की पीठ के सामने एक शख्स काला कोट पहनकर दाखिल हुआ। खुद को कानून से ऊपर समझते हुए उसने जजों को ‘मिस्टर ज्यूडिशियल सर्वेंट’ कहकर संबोधित किया और लखनऊ के विकासनगर एसीपी के खिलाफ तत्काल एफआईआर (FIR) दर्ज करने का हुक्म सुनाने लगा। जब हैरान जजों ने पूछा कि क्या वह अदालत को आदेश दे रहा है, तो उसने बेखौफ अंदाज में हामी भरी और अपने हाथ में मौजूद 185 पन्नों के कानूनी दस्तावेजों को हवा में उड़ा दिया। इतना ही नहीं, उसने चीफ जस्टिस (CJI) के लिए बेहद आपत्तिजनक और अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल किया। सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत मुस्तैदी दिखाते हुए उसे दबोच लिया, हालांकि कोर्ट ने उसकी मानसिक स्थिति को देखते हुए उसे हिरासत में तो लिया पर बाद में सख्त सजा के बिना छोड़ दिया। लेकिन इस ड्रामे के पीछे की कहानी बेहद चौंकाने वाली है।

एक ईमेल और बर्बाद हुआ करियर: मुस्लिम सहकर्मी से विवाद में गई थी नौकरी

सुप्रीम कोर्ट के भीतर इस सनसनीखेज वारदात को अंजाम देने वाले शख्स का नाम प्रबल प्रताप यादव है, जो उत्तर प्रदेश के इटावा (भरथना) का मूल निवासी है। कभी अपनी बुद्धिमानी के दम पर सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनने वाला प्रबल लखनऊ के विकासनगर की एक नामी आईटी कंपनी में अच्छे पद पर काम कर रहा था। सब कुछ सही चल रहा था, लेकिन तभी उसकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया जिसने उसे अपराधी की राह पर धकेल दिया। कंपनी में काम करने के दौरान प्रबल का अपनी एक मुस्लिम महिला सहकर्मी के साथ गंभीर विवाद हो गया। आरोप है कि प्रबल ने उस महिला कर्मचारी को बेहद आपत्तिजनक और अश्लील ईमेल भेजे, साथ ही उस पर भद्दे कमेंट्स भी किए। महिला की शिकायत पर कंपनी प्रबंधन ने प्रबल को कई बार समझाया और सुधरने की चेतावनी दी। जब प्रबल की हरकतें बंद नहीं हुईं, तो कंपनी ने कड़ा रुख अपनाते हुए उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया। बस यही वह मोड़ था, जहां से प्रबल के भीतर बदले की आग भड़क उठी।

थाने से लेकर हाईकोर्ट तक का चक्कर: जब सनक में बदला कानूनी इंसाफ का रास्ता

नौकरी से निकाले जाने के बाद प्रबल प्रताप यादव ने कानून को हथियार बनाकर कंपनी को बर्बाद करने की ठान ली। उसने अपनी पूर्व कंपनी पर ‘देश विरोधी गतिविधियों’ में शामिल होने का संगीन आरोप मढ़ दिया। वह लखनऊ के विकासनगर थाने पहुंचा, लेकिन पुलिस ने उसकी कहानी को मनगढ़ंत मानकर एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया। इसके बाद प्रबल ने नवंबर 2025 में लखनऊ की सीजीएम (CGM) कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट के आदेश पर पुलिस ने 26 फरवरी 2026 को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसके आधार पर अदालत ने इसे सीधे एफआईआर बनाने के बजाय एक निजी शिकायत (प्राइवेट कंप्लेंट) के रूप में दर्ज कर लिया। प्रबल हर हाल में पुलिस केस चाहता था, इसलिए उसने इस फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में चुनौती दी। 6 अप्रैल 2026 को हाईकोर्ट ने भी उसकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि मामला पहले से ही निचली अदालत में चल रहा है। हर जगह से मिली नाकामी ने उसकी सनक को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया और उसने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल: न्याय के मंदिर में पहले भी हो चुके हैं ऐसे जानलेवा हमले

सुप्रीम कोर्ट में प्रबल यादव द्वारा की गई यह हरकत कोई पहली घटना नहीं है। न्याय के इस सर्वोच्च मंदिर में पहले भी सुरक्षा में चूक और जजों पर हमले की कोशिशें हो चुकी हैं। अभी पिछले साल 2025 में ही एक वकील राकेश किशोर ने सुनवाई के दौरान नारेबाजी करते हुए तत्कालीन सीजेआई बीआर गवई की तरफ जूता उछालने का प्रयास किया था। इससे भी पीछे जाएं तो 26 फरवरी 1999 को नंदलाल बलवानी नाम के एक वकील ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एएस आनंद की पीठ पर जूता फेंक दिया था, जिसके बाद उस वकील का लाइसेंस हमेशा के लिए रद्द कर दिया गया था। प्रबल प्रताप यादव के इस ताजा मामले ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की त्रिस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह उठता है कि एक आम याचिकाकर्ता इतनी भारी मात्रा में दस्तावेज लेकर जजों के इतने करीब कैसे पहुंच गया और उसने सरेआम न्यायपालिका को अपमानित कैसे कर दिया? इस घटना ने अदालतों की सुरक्षा को अभेद्य बनाने की बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है।

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