कानपुर में ‘कुर्सी’ छीनने वाला टाइपिंग टेस्ट! 1 मिनट में 25 शब्द भी नहीं लिख पाए 3 बाबू, डीएम ने क्लर्क से बनाया चपरासी

उत्तर प्रदेश के कानपुर कलेक्ट्रेट से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने सरकारी महकमे में हड़कंप मचा दिया है। अक्सर सरकारी नौकरियों में प्रमोशन की खबरें तो सुनने को मिलती हैं, लेकिन यहाँ मामला बिल्कुल उल्टा है। कानपुर के जिलाधिकारी (DM) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए तीन बाबुओं (लिपिकों) का डिमोशन कर उन्हें सीधे चपरासी बना दिया है। इन बाबुओं की ‘कुर्सी’ छीनने की वजह बेहद हैरान करने वाली है। दरअसल, ये तीनों बाबू टाइपिंग टेस्ट में बुरी तरह फेल हो गए और एक मिनट में महज 25 शब्द भी टाइप नहीं कर सके। इस आदेश के बाद कलेक्ट्रेट के अन्य कर्मचारियों के पसीने छूट रहे हैं।

बार-बार मिला मौका, फिर भी रहे फिसड्डी

प्रशासनिक कार्यप्रणाली को दुरुस्त करने के लिए कानपुर कलेक्ट्रेट में समय-समय पर बाबुओं की कार्यक्षमता की जांच की जाती है। इन तीन बाबुओं की टाइपिंग की रफ्तार को लेकर लंबे समय से शिकायतें थीं। प्रशासन ने इन्हें अपनी टाइपिंग सुधारने के लिए एक नहीं, बल्कि कई मौके दिए। विभागीय परीक्षा का आयोजन किया गया ताकि वे साबित कर सकें कि वे क्लर्क पद के योग्य हैं। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि तीनों ही बाबू निर्धारित मानक ’25 शब्द प्रति मिनट’ की गति हासिल करने में नाकाम रहे। जब अंतिम अवसर पर भी नतीजा सिफर रहा, तो प्रशासन ने सख्त रुख अपनाते हुए उन्हें उनके पद से हटाने का निर्णय लिया।

क्लर्क से सीधे बने चपरासी

जिलाधिकारी ने अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए इन तीनों बाबुओं के विरुद्ध डिमोशन की कार्रवाई सुनिश्चित की। आदेश के मुताबिक, चूंकि ये कर्मचारी लिपिकीय (Clerical) कार्यों के लिए अनिवार्य कौशल ‘टाइपिंग’ में अक्षम पाए गए हैं, इसलिए इन्हें अब चतुर्थ श्रेणी (Class IV) यानी चपरासी के पद पर तैनात किया गया है। अब ये तीनों कर्मचारी फाइलें टाइप करने के बजाय कलेक्ट्रेट में फाइलों को इधर-बदल करने और अन्य चपरासी वाले काम करते नजर आएंगे। इस कड़े फैसले ने साफ संदेश दे दिया है कि सरकारी काम में लापरवाही और स्किल की कमी अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

सरकारी सिस्टम में हड़कंप

इस कार्रवाई के बाद कानपुर के सरकारी विभागों में सन्नाटा पसरा हुआ है। कलेक्ट्रेट के अन्य बाबू और कर्मचारी अब डर के साये में हैं कि कहीं अगली बारी उनकी न हो। आमतौर पर सरकारी नौकरी मिलने के बाद कर्मचारी अपनी स्किल्स पर ध्यान देना छोड़ देते हैं, लेकिन कानपुर की इस घटना ने बता दिया है कि पद पर बने रहने के लिए आपको अपडेट रहना होगा। अधिकारियों का कहना है कि डिजिटल इंडिया के दौर में अगर बाबू को टाइपिंग ही नहीं आएगी, तो सरकारी कामकाज की रफ्तार सुस्त हो जाएगी। इसी सुस्ती को खत्म करने के लिए यह ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की गई है।

प्रशासन का सख्त रुख

कानपुर प्रशासन की इस कार्रवाई को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति से जोड़कर देखा जा रहा है। सरकार लगातार ऐसे कर्मचारियों की छंटनी या उन पर कार्रवाई कर रही है जो काम में ढीले हैं या भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। कलेक्ट्रेट सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में कुछ और कर्मचारियों की कार्यक्षमता की जांच हो सकती है। जो कर्मचारी कंप्यूटर और टाइपिंग में फिसड्डी पाए जाएंगे, उन पर भी इसी तरह की गाज गिर सकती है। फिलहाल, इन तीन ‘पूर्व बाबुओं’ की चर्चा पूरे उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में जोरों पर है।

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