लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में हॉस्टल के खाने को लेकर नया विवाद सामने आया है। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने छात्रावासों में केवल शाकाहारी भोजन परोसने का फैसला लिया है। इस निर्णय के बाद छात्रों के बीच अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ छात्र इसे अच्छा कदम बता रहे हैं, जबकि कई छात्रों का कहना है कि उन्हें अपनी पसंद का भोजन चुनने का अधिकार होना चाहिए। बताया जा रहा है कि पहले हॉस्टल में सीमित स्तर पर कुछ नॉनवेज विकल्प उपलब्ध होते थे, लेकिन अब पूरी तरह शाकाहारी मेन्यू लागू करने की तैयारी की जा रही है। इस फैसले ने कैंपस के अंदर चर्चा का माहौल बना दिया है।
प्रबंधन का दावा- स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर लिया गया फैसला
यूनिवर्सिटी प्रशासन का कहना है कि यह फैसला छात्रों की सेहत और बेहतर खानपान को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। हॉस्टल प्रबंधन के अनुसार नया मेन्यू तैयार किया जा रहा है, जिसमें प्रोटीन, पोषण और संतुलित आहार का पूरा ध्यान रखा जाएगा। अधिकारियों का कहना है कि छात्रों को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जाएगा ताकि उनकी पढ़ाई और स्वास्थ्य दोनों प्रभावित न हों। प्रबंधन का यह भी कहना है कि यह निर्णय किसी विशेष वर्ग को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि भोजन व्यवस्था को बेहतर बनाने के उद्देश्य से लिया गया है। हालांकि इस स्पष्टीकरण के बावजूद कुछ छात्र फैसले से संतुष्ट नहीं दिख रहे हैं।
छात्रों ने उठाए सवाल, पसंद की आजादी की मांग
कई छात्रों का कहना है कि मेडिकल यूनिवर्सिटी में देश के अलग-अलग हिस्सों से विद्यार्थी पढ़ने आते हैं और उनकी खानपान की आदतें भी अलग होती हैं। ऐसे में सभी के लिए एक जैसा नियम लागू करना उचित नहीं माना जा सकता। कुछ छात्रों का मानना है कि शाकाहारी भोजन उपलब्ध कराया जाना अच्छी बात है, लेकिन जो छात्र नॉनवेज खाना चाहते हैं, उनके लिए भी विकल्प होना चाहिए। छात्रों का कहना है कि यह केवल भोजन का मामला नहीं, बल्कि व्यक्तिगत पसंद और सुविधा से जुड़ा विषय है। वहीं कुछ अन्य छात्रों ने प्रशासन के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि यदि भोजन पौष्टिक और संतुलित है तो इस बदलाव से कोई बड़ी परेशानी नहीं होगी।
मामले में राजनीति की भी एंट्री, विपक्ष ने उठाए सवाल
हॉस्टल के मेन्यू को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक रंग भी लेने लगा है। विपक्षी दलों ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए सरकार और प्रशासन की आलोचना की है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं का कहना है कि शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों की मूल समस्याओं पर ध्यान देने के बजाय ऐसे मुद्दों को आगे लाया जा रहा है। उनका आरोप है कि इस तरह के फैसले छात्रों के बीच अनावश्यक बहस पैदा कर सकते हैं। वहीं दूसरी ओर प्रशासन अपने फैसले को सही ठहरा रहा है और इसे केवल स्वास्थ्य व अनुशासन से जुड़ा निर्णय बता रहा है। फिलहाल KGMU का यह मामला कैंपस से निकलकर राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का विषय बन चुका है और आने वाले दिनों में इस पर बहस और तेज हो सकती है।
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