देश में जाति आधारित आरक्षण में बदलाव की मांग को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है। दिल्ली समेत कई शहरों में आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा, आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को अधिक मदद और क्रीमी लेयर जैसे मुद्दों को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनका उद्देश्य आरक्षण खत्म करना नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार करना है, ताकि जरूरतमंद लोगों तक इसका लाभ पहुंचे। वहीं इस मांग का दलित और पिछड़े वर्ग के कई नेताओं ने खुलकर विरोध किया है। चिराग पासवान और रामदास अठावले ने आरक्षण को संवैधानिक अधिकार बताया है। अखिलेश यादव, मायावती, प्रकाश आंबेडकर और चंद्रशेखर आजाद ने भी आरक्षण सुधार की मांग को लेकर सवाल उठाए हैं। इस बीच उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने आंदोलन से जुड़े कुछ छात्रों से मुलाकात कर उनकी मांगें सुनीं और केंद्रीय मंत्री से बातचीत कराने का भरोसा दिया है।
UP चुनाव से पहले आरक्षण बना बड़ा मुद्दा
आरक्षण को लेकर बढ़ती बहस का असर राजनीतिक तौर पर सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में दिखाई दे रहा है, जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने आरोप लगाया है कि सुधार के नाम पर आरक्षण खत्म करने की कोशिश की जा रही है। वहीं मायावती ने आर्थिक आधार पर SC, ST और OBC आरक्षण की जगह लेने की मांग को अनुचित बताया है। प्रकाश आंबेडकर ने जंतर-मंतर के प्रदर्शन को कथित उच्च जातीय वर्चस्व से जोड़ते हुए BJP-RSS पर राजनीतिक आयोजन का आरोप लगाया है और कांग्रेस की चुप्पी पर भी सवाल उठाया है। दूसरी ओर, RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि जब तक समाज में असमानता मौजूद है, तब तक आरक्षण की जरूरत रहेगी। ऐसे में जाति आरक्षण का मुद्दा अब केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग राजनीतिक दलों के बीच विचारों की सीधी टक्कर बन गया है।
महिला आरक्षण पर BJP-कांग्रेस आमने-सामने
जाति आरक्षण के विवाद के साथ महिला आरक्षण को लेकर भी बीजेपी और कांग्रेस में नया वार-पलटवार शुरू हो गया है। बीजेपी नेता स्मृति ईरानी ने कांग्रेस से महिला आरक्षण कानून को जल्द लागू करने में समर्थन देने की अपील की है। इसके जवाब में कांग्रेस का कहना है कि पार्टी ने महिला आरक्षण कानून का संसद में पूरा समर्थन किया था, लेकिन सरकार ने इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़ दिया। विपक्ष का तर्क है कि महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए कानून को जल्द लागू किया जाना चाहिए। इसी बीच परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्तावों को लेकर भी राजनीतिक चर्चा तेज है। दक्षिणी राज्यों की ओर से परिसीमन के बाद प्रतिनिधित्व प्रभावित होने की आशंका जताई जाती रही है, जबकि केंद्र सरकार इस तरह की चिंताओं से इनकार करती रही है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े मुद्दों को लेकर संसद में अगला कदम कब उठाती है।
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