पवन खेड़ा ने सरकार से पूछा- कानून को इतने समय तक क्यों रोका?
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा कि महिला आरक्षण विधेयक को लोकसभा ने 20 सितंबर 2023 और राज्यसभा ने 21 सितंबर 2023 को मंजूरी दी थी। इसके बाद 28 सितंबर को राष्ट्रपति की स्वीकृति भी मिल गई थी। खेड़ा का दावा है कि कांग्रेस ने संसद के दोनों सदनों में इस कानून का समर्थन किया था। उन्होंने सवाल उठाया कि जब कानून को संसद और राष्ट्रपति की मंजूरी मिल चुकी थी तो इसके बाद भी इसे लागू करने की प्रक्रिया में लंबा समय क्यों लगा। उन्होंने सरकार से यह भी पूछा कि महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़ने का फैसला क्यों किया गया। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस अब सरकार पर महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने में देरी का आरोप लगा रही है।
राहुल गांधी के बयान पर BJP का पलटवार
यह विवाद राहुल गांधी के महिलाओं के अधिकार और मनुस्मृति को लेकर दिए गए बयान के बाद और बढ़ गया। राहुल गांधी ने पुणे के एक कार्यक्रम में आरोप लगाया था कि महिलाओं को दबाने वाली सोच मनुस्मृति से आती है। उन्होंने कहा था कि वह ऐसा भारत चाहते हैं, जहां महिलाओं को सम्मान और बराबरी मिले। इसके बाद बीजेपी ने कांग्रेस पर पलटवार किया। पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी से महिला आरक्षण कानून को जल्द लागू करने के समर्थन में आगे आने की अपील की। उन्होंने कहा कि महिलाओं के अधिकारों की बात को सिर्फ बयान तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले कानून को लागू कराने की दिशा में भी समर्थन देना चाहिए।
कांग्रेस ने बताया- 2023 में ही दिया था पूरा समर्थन
कांग्रेस की ओर से पी. चिदंबरम ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के राहुल गांधी पर लगाए गए आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि 2023 में संसद से पारित संविधान संशोधन के दौरान कांग्रेस ने दोनों सदनों में विधेयक का समर्थन किया था। इस कानून के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है। कांग्रेस का कहना है कि उसका विरोध कानून के उद्देश्य से नहीं, बल्कि इसके लागू होने को जनगणना और परिसीमन से जोड़ने को लेकर है। वहीं बीजेपी इसे महिलाओं को राजनीतिक भागीदारी देने की दिशा में अहम कदम बताते हुए कांग्रेस से अपने रुख को स्पष्ट करने को कह रही है। ऐसे में महिला आरक्षण और परिसीमन का मुद्दा आने वाले दिनों में भी सियासत का बड़ा केंद्र बना रह सकता है।








