कोलकाता से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है। शहर के जाने-माने कार्डियोलॉजिस्ट Prakash Kumar Hazra ने अपने क्लिनिक में आने वाले मरीजों के लिए एक अनोखा ऑफर पेश किया। इस ऑफर के तहत अगर मरीज “जय श्री राम” बोलते हैं, तो उन्हें कंसल्टेशन फीस में 500 रुपये की छूट दी जाती है। इस ऑफर का पोस्टर जैसे ही सामने आया, यह तेजी से वायरल हो गया और लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया। आमतौर पर अस्पतालों में त्योहारों या खास मौकों पर छूट दी जाती है, लेकिन इस तरह के नारे से जुड़ा ऑफर पहली बार सामने आया है, जिससे लोग हैरान भी हैं और सवाल भी उठा रहे हैं।
मरीजों को मिला डिस्काउंट, डॉक्टर ने दी सफाई
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस ऑफर के तहत कुछ मरीजों को वास्तव में छूट भी दी गई। बताया जा रहा है कि डॉक्टर ने एक क्यूआर कोड के साथ यह स्कीम जारी की थी, जिससे मरीजों को सुविधा भी दी गई। Prakash Kumar Hazra ने अपने बयान में कहा कि वे सिर्फ लोगों की मदद करना चाहते हैं और इसमें कोई गलत बात नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि “जय श्री राम” को वे केवल धार्मिक नारा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक अभिव्यक्ति के रूप में देखते हैं। डॉक्टर का मानना है कि हर व्यक्ति को अपनी राय रखने का अधिकार है और उसी के तहत उन्होंने यह ऑफर शुरू किया। हालांकि, उनके इस बयान के बाद विवाद और गहरा गया है।
लो भय्या, एक और आ गया बाजार में….कोलकाता के ये डॉक्टर साहब जय श्री राम बोलने पर लोगों को 500 रुपये का डिस्काउंट दे रहे हैं, अब आप ही बताओ ये सही है या गलत pic.twitter.com/0EYJgI7HJC
— आजाद भारत का आजाद नागरिक (@AnathNagrik) April 14, 2026
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
जैसे ही यह मामला सोशल मीडिया पर सामने आया, लोगों की प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गईं। कुछ लोगों ने डॉक्टर के इस कदम का समर्थन किया और इसे उनकी व्यक्तिगत पसंद बताया, वहीं कई यूजर्स ने इसे गलत और असंवेदनशील करार दिया। आलोचकों का कहना है कि इलाज जैसी जरूरी सेवा को किसी धार्मिक या राजनीतिक नारे से जोड़ना उचित नहीं है। वहीं समर्थकों का तर्क है कि यह एक निजी ऑफर है और किसी पर इसे मानने का दबाव नहीं है। इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या चिकित्सा सेवाओं को इस तरह की गतिविधियों से जोड़ा जाना चाहिए या नहीं।
चिकित्सा और आस्था के बीच संतुलन पर सवाल
इस पूरे मामले ने चिकित्सा पेशे की नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत में हर व्यक्ति को अपनी धार्मिक और राजनीतिक अभिव्यक्ति का अधिकार है, लेकिन जब बात स्वास्थ्य सेवाओं की आती है, तो वहां निष्पक्षता और समानता की उम्मीद की जाती है। डॉक्टरों को मरीजों के साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करना चाहिए और इलाज केवल चिकित्सा जरूरत के आधार पर होना चाहिए। फिलहाल यह मामला चर्चा में बना हुआ है और देखना होगा कि क्या इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया आती है या यह सिर्फ सोशल मीडिया की बहस तक ही सीमित रहता है।
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