प्राइवेट नौकरी करने वालों के साथ अक्सर एक ही कहानी दोहराई जाती है—जब तक आप काम कर रहे हैं, तब तक सब ठीक है, लेकिन जैसे ही आपने इस्तीफा दिया, अपने ही हक के पैसों के लिए आपको कंपनी के एचआर और फाइनेंस विभाग के चक्कर काटने पड़ते हैं। कभी कहा जाता है कि ‘पॉलिसी के हिसाब से 45 दिन लगेंगे’ तो कभी ‘अगले महीने की सैलरी साइकिल’ का इंतजार करने को कहा जाता है। लेकिन अब केंद्र सरकार ने इन सभी बहानों पर ताला लगा दिया है। नए लेबर कोड (New Labour Code) के तहत अब कोई भी कंपनी आपके पैसों को महीनों तक नहीं दबा सकती। सरकार का यह सख्त रुख उन लाखों युवाओं के लिए बड़ी राहत है जो अपनी पुरानी बचत के भरोसे नई शुरुआत करना चाहते हैं।
48 घंटे का ‘डेडलाइन’ नियम: कंपनियों की बढ़ी टेंशन
नए नियमों में जो सबसे बड़ा धमाका हुआ है, वह है भुगतान की समयसीमा। नए लेबर कोड के प्रावधानों के अनुसार, यदि कोई कर्मचारी खुद नौकरी छोड़ता है, उसे पद से हटाया जाता है या कंपनी उसकी छंटनी करती है, तो संस्थान की यह कानूनी जिम्मेदारी होगी कि वह 48 घंटे (दो कार्य दिवस) के भीतर उसका ‘फुल एंड फाइनल सेटलमेंट’ करे। इसका मतलब है कि आपके ऑफिस से बाहर कदम रखते ही दो दिनों के अंदर आपका सारा बकाया आपके बैंक खाते में होना चाहिए। यह नियम इसलिए लाया गया है ताकि किसी भी कर्मचारी को आर्थिक तंगी का सामना न करना पड़े। अब तक जो कंपनियां 90 दिनों तक पैसा रोककर रखती थीं, उन्हें अब अपना पूरा सिस्टम बदलना होगा।
सैलरी का नया गणित और आपकी बचत का ‘मोटा’ फंड
इस कानून में सिर्फ समय ही नहीं बदला है, बल्कि आपकी सैलरी की बनावट (Salary Structure) में भी बड़ा फेरबदल हुआ है। नए कोड के मुताबिक, किसी भी कर्मचारी की ‘बेसिक सैलरी’ उसके कुल वेतन (CTC) की कम से कम 50% होनी चाहिए। इसका असर यह होगा कि आपका पीएफ (PF) और ग्रेच्युटी का हिस्सा पहले के मुकाबले काफी बढ़ जाएगा। हालांकि, इससे आपके हाथ में आने वाली मासिक सैलरी (Take Home Salary) थोड़ी कम जरूर दिख सकती है, लेकिन जब आप नौकरी छोड़ेंगे, तो 48 घंटे के भीतर मिलने वाला ग्रेच्युटी और पीएफ का पैसा काफी बड़ा और राहत देने वाला होगा। यह बदलाव लंबी अवधि के निवेश और रिटायरमेंट के लिहाज से किसी मास्टरस्ट्रोक से कम नहीं है।
डिजिटल होगा सिस्टम, खत्म होगी बाबूगिरी
कंपनियों के लिए यह नियम किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। अब तक ज्यादातर कंपनियां मैनुअल तरीके से पेरोल चलाती थीं, जिसमें काफी समय लगता था। लेकिन 48 घंटे की इस डेडलाइन को पूरा करने के लिए अब कंपनियों को पूरी तरह से डिजिटल और ऑटोमेटेड सिस्टम अपनाना होगा। इस बदलाव से मार्केट में पारदर्शिता आएगी और कर्मचारियों का शोषण बंद होगा। अगर कोई कंपनी इन नियमों की अनदेखी करती है, तो उस पर भारी जुर्माने का भी प्रावधान है। कुल मिलाकर, मोदी सरकार का यह नया लेबर कोड नौकरीपेशा लोगों को ‘कॉर्पोरेट गुलामी’ और ‘पेमेंट की देरी’ से आजादी दिलाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।








