इंसान की मौत होते ही क्यों बांध दिए जाते हैं हाथ-पैर? जानें इसके पीछे का वो डरावना सच और वैज्ञानिक कारण!

मृत्यु एक ऐसा अकाट्य सत्य है, जिससे संसार का कोई भी प्राणी बच नहीं सकता। सनातन धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक 16 संस्कारों का वर्णन मिलता है, जिनमें अंतिम संस्कार को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। आपने अक्सर देखा होगा कि जब किसी व्यक्ति के प्राण पखेरू उड़ जाते हैं, तो घर के बुजुर्ग सबसे पहले उसके हाथ-पैर के अंगूठों को एक सफेद सूती धागे से बांध देते हैं। इसके साथ ही, मृतक के नाक और कान में तुरंत रूई ठूंस दी जाती है। आखिर ऐसा क्यों किया जाता है? क्या इसके पीछे सिर्फ सदियों पुराना अंधविश्वास है या फिर कोई गहरा रहस्य छिपा है? हिंदू धर्म के सबसे प्रामाणिक ग्रंथों में से एक ‘गरुड़ पुराण’ के प्रेत कल्प में इस पूरी प्रक्रिया का एक ऐसा खौफनाक और चौंकाने वाला सच बताया गया है, जिसे आम तौर पर लोग नहीं जानते। मौत के ठीक बाद का समय बेहद संवेदनशील होता है, क्योंकि उस वक्त इंसान का भौतिक शरीर तो निष्क्रिय हो जाता है, लेकिन उसके आसपास की ऊर्जाएं सक्रिय हो जाती हैं।

नौ द्वारों का रहस्य और तड़पती हुई आत्मा का दोबारा प्रवेश

गरुड़ पुराण के दसवें अध्याय में साफ तौर पर बताया गया है कि जब इंसान के शरीर से प्राण निकलते हैं, तो आत्मा का आकार बहुत छोटा, यानी हाथ के अंगूठे की पोर जितना रह जाता है। शरीर से बाहर निकलने के बाद भी आत्मा तुरंत इस दुनिया को छोड़कर नहीं जाती। उसका अपने सालों पुराने शरीर और रोते-बिलखते परिजनों से मोह इतनी जल्दी खत्म नहीं होता। जब वह अपने परिवार को दुख में देखती है, तो वह तड़प उठती है और दोबारा अपने उसी बेजान शरीर में घुसने की पुरजोर कोशिश करती है। मानव शरीर में नौ मुख्य प्राकृतिक द्वार होते हैं—जैसे आंख, कान, नाक, मुंह और मल-मूत्र मार्ग। अगर इन द्वारों को खुला छोड़ दिया जाए, तो आत्मा मोहवश दोबारा अंदर प्रवेश करने का प्रयास करेगी, जिससे उसे अत्यधिक कष्ट होगा क्योंकि वह शरीर अब मृत हो चुका है। इसी प्रवेश को रोकने के लिए पैर के अंगूठों को आपस में बांधा जाता है और नाक-कान के छिद्रों को रूई से पूरी तरह ब्लॉक कर दिया जाता है, ताकि आत्मा को यह समझ आ सके कि अब यह सफर खत्म हो चुका है।

खाली शरीर पर कब्जा करने की फिराक में घूमती बुरी शक्तिया

इस रस्म के पीछे का दूसरा सबसे बड़ा कारण बेहद डरावना और आध्यात्मिक है। गरुड़ पुराण के अनुसार, जैसे ही जीवात्मा शरीर को छोड़ती है, वह काया एक ‘खाली मकान’ की तरह हो जाती है। हमारे वायुमंडल में कई तरह की अदृश्य, नकारात्मक और तामसिक शक्तियां (भूत-प्रेत या बुरी आत्माएं) घूमती रहती हैं। ये शक्तियां हमेशा एक ऐसे खाली और बेजान शरीर की तलाश में रहती हैं, जिस पर वे आसानी से कब्जा कर सकें। यदि मृत शरीर के अंगों को बांधकर उसके प्राकृतिक द्वारों को सुरक्षित न किया जाए, तो ये बुरी ताकतें शव के भीतर घुसकर उसे दूषित कर सकती हैं या उसका दुरुपयोग कर सकती हैं। यही वजह है कि शास्त्रों में अंतिम संस्कार होने तक मृत शरीर को एक सेकंड के लिए भी अकेला छोड़ने की सख्त मनाही है। घर का कोई न कोई सदस्य हमेशा शव के पास बैठकर रखवाली करता है और भगवान के नाम का जाप करता रहता है ताकि कोई भी नकारात्मक ऊर्जा आसपास भी न फटक सके।

अकड़ता हुआ शरीर और मल-मूत्र द्वार को ब्लॉक करने का विज्ञान

धार्मिक मान्यताओं से इतर, अगर हम इस प्रक्रिया को आधुनिक विज्ञान और व्यावहारिक नजरिए से देखें, तो इसके पीछे ठोस चिकित्सा विज्ञान काम करता है। मृत्यु के कुछ ही घंटों के भीतर मानव शरीर में ‘रिगर मोर्टिस’ (Rigor Mortis) यानी मांसपेशियों का अकड़ना शुरू हो जाता है। अगर सही समय पर शव के हाथ और पैरों को सीधा करके बांधा न जाए, तो अंग टेढ़े-मेढ़े होकर उसी स्थिति में अकड़ जाएंगे। ऐसी स्थिति में श्मशान घाट ले जाते समय अर्थी पर शव को सही मुद्रा में लिटाना नामुमकिन हो जाएगा। इसके अलावा, मौत के बाद शरीर की सभी नसें और मांसपेशियां पूरी तरह ढीली (Relax) हो जाती हैं। इस शिथिलता के कारण शरीर के भीतर मौजूद गंदगी या मल-मूत्र बाहर निकलने का भारी खतरा रहता है। पैरों के अंगूठों को आपस में कसकर बांधने से शरीर का निचला हिस्सा संकुचित हो जाता है, जिससे आंतरिक गंदगी बाहर नहीं आ पाती और शव की पवित्रता व मर्यादा अंतिम विदाई तक बनी रहती है। अंततः, जब तक शरीर को मुखाग्नि देकर पंचतत्व में विलीन नहीं किया जाता, तब तक आत्मा का भटकाव जारी रहता है। अग्निदाह के बाद ही उसे असली मुक्ति मिलती है और वह परलोक की यात्रा पर आगे बढ़ती है।

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