भारत में प्रस्तावित फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) में बदलाव को लेकर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा शुरू हो गई है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के सांसद राइली मूर ने इस प्रस्तावित संशोधन पर चिंता जताई है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए दावा किया कि यदि यह कानून मौजूदा स्वरूप में लागू होता है तो चर्चों और धार्मिक संस्थाओं के कामकाज पर सरकारी नियंत्रण बढ़ सकता है। मूर ने इसे ईसाई समुदाय के हितों से जुड़ा मामला बताते हुए कहा कि भारत में ईसाई धर्म का इतिहास काफी पुराना है और धार्मिक संस्थाओं की स्वतंत्रता बनी रहनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के कदम दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित कर सकते हैं। उनके बयान के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।
आखिर FCRA कानून क्या है?
फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट यानी FCRA वह कानून है, जो तय करता है कि भारत में गैर-सरकारी संगठन (NGO), धार्मिक संस्थाएं, शैक्षणिक संस्थान और चैरिटेबल ट्रस्ट विदेशी स्रोतों से मिलने वाले धन को किस तरह प्राप्त करेंगे और उसका उपयोग कैसे करेंगे। इस कानून के तहत विदेशी फंड लेने वाली संस्थाओं को गृह मंत्रालय से पंजीकरण कराना अनिवार्य होता है। अब केंद्र सरकार ने इस कानून में कुछ संशोधन प्रस्तावित किए हैं। सरकार का कहना है कि इन बदलावों का उद्देश्य विदेशी फंड के उपयोग में अधिक पारदर्शिता, जवाबदेही और निगरानी सुनिश्चित करना है ताकि धन का इस्तेमाल तय नियमों के अनुसार हो सके। हालांकि प्रस्तावित संशोधन पर अभी संसद में चर्चा जारी है और अंतिम फैसला विधायी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होगा।
विपक्ष और कुछ संगठनों की क्या है चिंता?
प्रस्तावित संशोधनों को लेकर विपक्षी दलों, कुछ गैर-सरकारी संगठनों और धार्मिक संस्थाओं ने अपनी चिंताएं भी सामने रखी हैं। उनका कहना है कि नए प्रावधान लागू होने के बाद विदेशी सहायता पर निर्भर संस्थाओं पर सरकारी निगरानी पहले की तुलना में अधिक बढ़ सकती है। कुछ चर्च और सामाजिक संगठनों को यह भी आशंका है कि यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण समय पर नवीनीकृत नहीं हो पाता, तो उसके संचालन पर असर पड़ सकता है। इन संगठनों का मानना है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा से जुड़े उनके कार्य प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर सरकार की ओर से अभी तक यही कहा गया है कि किसी भी बदलाव का उद्देश्य कानून का बेहतर पालन सुनिश्चित करना है और प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप मजबूत बनाना है।
क्या भारत-अमेरिका संबंधों पर पड़ेगा असर?
राइली मूर के बयान के बाद इस मुद्दे को भारत और अमेरिका के संबंधों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि अभी तक अमेरिकी प्रशासन की ओर से इस विषय पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी एक सांसद का बयान दोनों देशों की आधिकारिक विदेश नीति का प्रतिनिधित्व नहीं करता। भारत और अमेरिका के बीच रक्षा, व्यापार, तकनीक और रणनीतिक साझेदारी लगातार मजबूत हुई है और दोनों देश कई वैश्विक मुद्दों पर साथ काम कर रहे हैं। ऐसे में FCRA संशोधन को लेकर अंतिम तस्वीर संसद में होने वाली चर्चा और कानून के अंतिम स्वरूप के बाद ही स्पष्ट होगी। फिलहाल यह मामला देश और विदेश दोनों जगह राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है।
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