मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भ रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अगर गर्भ कानून में तय समय सीमा के अंदर है, तो महिला खुद तय करेगी कि वह बच्चा चाहती है या नहीं। इस मामले में कोर्ट ने 13 सप्ताह की गर्भवती महिला को गर्भपात की अनुमति दे दी। अदालत ने कहा कि गर्भावस्था का सबसे ज्यादा असर महिला के शरीर और मानसिक स्थिति पर पड़ता है, इसलिए फैसला लेने का अधिकार भी उसी का है।
पति से अलग रहने के बाद महिला पहुंची कोर्ट
यह मामला इंदौर के एक पति-पत्नी का है। दोनों की शादी करीब दो साल पहले हुई थी। कुछ समय बाद दोनों के बीच विवाद शुरू हो गया और महिला अपने पति से अलग रहने लगी। इसी दौरान उसे पता चला कि वह गर्भवती है। महिला ने कोर्ट में कहा कि वह इस बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती। उसने गर्भपात की अनुमति मांगी। कोर्ट ने उसकी बात सुनी और कानून के अनुसार उसे गर्भपात की इजाजत दे दी।
पति की मंजूरी जरूरी नहीं, कोर्ट ने किया साफ
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अगर गर्भावस्था मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी (MTP) एक्ट, 1971 के तहत तय समय सीमा के अंदर है, तो महिला को गर्भपात के लिए पति की अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। अदालत ने कहा कि महिला की आजादी, सम्मान और मानसिक स्वास्थ्य संविधान से मिले अधिकार हैं। इसलिए गर्भ रखना है या नहीं, इसका फैसला महिला खुद करेगी, कोई दूसरा नहीं।
महिलाओं के अधिकारों के लिए अहम फैसला
कानूनी जानकारों का कहना है कि यह फैसला महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करता है। कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि गर्भावस्था से जुड़ा फैसला महिला की इच्छा के अनुसार होना चाहिए। अगर कानून की सभी शर्तें पूरी होती हैं, तो अधिकृत डॉक्टर गर्भपात कर सकते हैं। माना जा रहा है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में भी अहम भूमिका निभाएगा और महिलाओं को अपने अधिकारों के बारे में जागरूक करेगा।
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