‘उम्रकैद’ के मुजरिम पर दिल हार बैठी महिला जेलर: मजहब की दीवार ढहाई, फिर सलाखों के बाहर रचाई शादी!

कहते हैं कि प्यार न तो सरहदें देखता है और न ही सलाखें। कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला उस प्रेम कहानी में, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। यह कहानी एक हिंदू कैदी और एक मुस्लिम महिला सहायक अधीक्षक (जेलर) की है। साल 2007 में एक शख्स को उम्रकैद की सजा हुई थी, लेकिन नियति ने उसके लिए कुछ और ही लिख रखा था। जेल की ड्यूटी के दौरान महिला अधिकारी और कैदी के बीच बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ, जो धीरे-धीरे अटूट प्रेम में बदल गया। कैदी के अच्छे आचरण के कारण उसे 4 साल पहले रिहा कर दिया गया, लेकिन उनकी मोहब्बत का सफर यहीं खत्म नहीं हुआ, बल्कि एक नई शुरुआत की दहलीज पर पहुँच गया।

मजहब और समाज से बगावत: 5 मई को लिए सात फेरे

इस प्रेम कहानी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब धर्म और जाति की दीवारें सामने खड़ी हो गईं। महिला जेलर मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखती थीं और पुरुष हिंदू था। समाज और परिवार की ओर से इस रिश्ते का कड़ा विरोध हुआ, लेकिन दोनों ने अपने फैसले पर अडिग रहने की ठानी। 5 मई को तमाम सामाजिक बंधनों को दरकिनार करते हुए इस जोड़े ने हिंदू रीति-रिवाज से विवाह कर लिया। यह शादी आज चर्चा का विषय बनी हुई है क्योंकि यह न केवल दो दिलों का मिलन है, बल्कि रूढ़िवादी सोच पर एक करारा प्रहार भी है। लोगों की जुबां पर ‘जीत’ फिल्म का वह गाना ‘दिल का क्या करें साहिब…’ बरबस ही आ रहा है।

राजस्थान की जेल में भी गूंजी थी प्यार की धमक

जेल के भीतर प्यार पनपने का यह कोई इकलौता मामला नहीं है। राजस्थान की एक जिला जेल में भी कुछ समय पहले ऐसा ही एक वाकया सामने आया था, जिसने प्रशासन की नींद उड़ा दी थी। वहाँ एक महिला प्रहरी (गार्ड) पर आरोप लगा था कि वह एक बंदी के मोहपाश में इस कदर बँध गई थी कि नियम-कायदों को ताक पर रख दिया गया। दोनों के बीच घंटों मोबाइल पर बातें होती थीं और जेल के गलियारों में उनकी मुलाकातों के किस्से आम हो गए थे। जब मामला उच्च अधिकारियों तक पहुँचा, तो जांच के बाद महिला प्रहरी का तबादला कर दिया गया। यह घटनाएं दर्शाती हैं कि जेल जैसी सख्त और तनावपूर्ण जगह पर भी मानवीय संवेदनाएं और भावनात्मक जुड़ाव अपनी जगह बना ही लेते हैं।

दुनियाभर में चर्चा का विषय बनती जेल की प्रेम कहानियाँ

कैदी और जेलर के बीच पनपे ये रिश्ते अक्सर सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल भी खड़े करते हैं और समाज को हैरान भी करते हैं। केवल भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी ऐसे कई मामले दर्ज किए गए हैं जहाँ सुरक्षाकर्मियों ने कैदियों की मदद करने या उनके साथ भागने की कोशिश की। हालांकि, इस ताज़ा मामले ने एक सकारात्मक उदाहरण पेश किया है क्योंकि यहाँ सजा पूरी होने और रिहाई के बाद कानून सम्मत तरीके से घर बसाया गया है। यह कहानी हमें सिखाती है कि सुधार की गुंजाइश हर इंसान में होती है और सच्चा प्रेम किसी भी सजा से बड़ा बदलाव लाने की ताकत रखता है।

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