हॉर्मुज से लेबनान तक ईरान की 4 शर्तें… क्या अमेरिका मानेगा या फिर बढ़ेगा तनाव? इस्लामाबाद वार्ता पर टिकी दुनिया की नजर

Iran US Talks: इस्लामाबाद में चल रही अमेरिका-ईरान शांति वार्ता ने वैश्विक राजनीति का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस अहम बैठक के दौरान ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने शहबाज शरीफ के सामने अपनी चार प्रमुख शर्तें रख दी हैं। ये शर्तें सिर्फ दो देशों के बीच समझौते तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मध्य पूर्व के हालात पर भी सीधा असर डाल सकती हैं। माना जा रहा है कि इन मांगों पर अमेरिका का रुख तय करेगा कि आगे शांति की दिशा में कदम बढ़ेगा या फिर टकराव और गहराएगा।

फ्रीज संपत्ति से हॉर्मुज तक, ईरान की बड़ी मांगें

ईरान ने जिन चार मांगों को सामने रखा है, उनमें सबसे अहम है उसकी विदेशों में फंसी संपत्तियों को तुरंत जारी करना। इसके अलावा उसने लेबनान में तत्काल युद्धविराम की भी शर्त रखी है। तीसरी मांग में हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की संख्या सीमित करने और पारगमन शुल्क लागू करने की बात कही गई है। चौथी और सबसे संवेदनशील मांग खाड़ी देशों से अमेरिकी सैनिकों की वापसी से जुड़ी है। इन शर्तों को ईरान की रणनीतिक चाल माना जा रहा है, जिससे वह क्षेत्रीय दबाव को संतुलित करना चाहता है।

अमेरिका के नरम संकेत, क्या बन पाएगा समझौता?

सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका ने ईरान की एक बड़ी मांग पर सकारात्मक संकेत दिए हैं। बताया जा रहा है कि कतर और अन्य देशों के बैंकों में फंसी ईरानी संपत्तियों को रिलीज करने पर सहमति बन सकती है। इस वार्ता में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व जेडी वेंस कर रहे हैं, जबकि डोनाल्ड ट्रंप के करीबी सहयोगी भी इसमें शामिल हैं। दोनों देशों के प्रतिनिधि लगातार बातचीत में लगे हुए हैं और शुरुआती संकेतों से लग रहा है कि कोई मध्य रास्ता निकल सकता है, हालांकि अभी तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है।

 ‘इजरायल फर्स्ट’ पर ईरान की चेतावनी

ईरान ने साफ कर दिया है कि अगर वार्ता में “इजरायल फर्स्ट” की नीति अपनाई गई तो समझौता संभव नहीं होगा। इस बयान से यह स्पष्ट हो गया है कि बातचीत बेहद संवेदनशील मोड़ पर है। साथ ही ईरान की सुरक्षा परिषद ने इस पूरी प्रक्रिया के लिए 15 दिनों की समयसीमा तय की है, जिसमें शुरुआती 48 घंटे बेहद अहम माने जा रहे हैं। सुरक्षा के लिहाज से रावलपिंडी और इस्लामाबाद में कड़ी व्यवस्था की गई है। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या ये वार्ता स्थायी शांति का रास्ता बनाएगी या फिर तनाव और बढ़ेगा।

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