बिहार सरकार में मंत्री बनाए गए Deepak Prakash की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिका में उनकी दोबारा नियुक्ति पर सवाल उठाए गए हैं। दावा किया गया है कि वह न तो विधायक हैं और न ही विधान परिषद के सदस्य, इसके बावजूद उन्हें मंत्री पद की शपथ दिलाई गई। इस मामले के सामने आने के बाद बिहार की राजनीति में चर्चा तेज हो गई है।
याचिकाकर्ता ने क्या कहा?
याचिका में कहा गया है कि दीपक प्रकाश को पहले भी मंत्री बनाया गया था, जबकि वह किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। बाद में सरकार बदलने के बाद उन्हें फिर से मंत्री पद की जिम्मेदारी दे दी गई। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह संविधान की भावना के खिलाफ है और इस मामले की जांच होनी चाहिए। इसी मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है।
संविधान में क्या है नियम?
भारतीय संविधान के अनुसार कोई व्यक्ति बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य बने मंत्री बन सकता है, लेकिन उसे छह महीने के भीतर किसी सदन का सदस्य बनना जरूरी होता है। अगर वह ऐसा नहीं कर पाता, तो उसे मंत्री पद छोड़ना पड़ता है। याचिका में इसी नियम का हवाला देते हुए नियुक्ति पर सवाल उठाए गए हैं। अब अदालत को यह तय करना होगा कि इस मामले में नियमों का पालन हुआ है या नहीं।
अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नजर
फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुका है और आगे की सुनवाई का इंतजार है। यदि अदालत इस याचिका पर सुनवाई करती है, तो बिहार सरकार से भी जवाब मांगा जा सकता है। इस मामले का असर केवल बिहार की राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में ऐसी नियुक्तियों से जुड़े मामलों पर भी पड़ सकता है। इसलिए इस मामले पर राजनीतिक और कानूनी दोनों क्षेत्रों की नजर बनी हुई है।
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