दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित नोबेल शांति पुरस्कार 2026 का आधिकारिक ऐलान हो गया है। नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने इस वर्ष यह सर्वोच्च सम्मान भारतीय मूल की दिग्गज वकील और पूर्व न्यायाधीश नवनेथम ‘नावी’ पिल्लै को देने का फैसला किया है। शांति, न्याय और मानवाधिकारों की रक्षा के क्षेत्र में उनके असाधारण और ऐतिहासिक योगदान को देखते हुए यह फैसला लिया गया। 10 दिसंबर को ओस्लो में आयोजित होने वाले भव्य समारोह में उन्हें पुरस्कार राशि के रूप में 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोना सौंपे जाएंगे।
रंगभेद के दौर में बनीं मंडेला और पीड़ितों की ढाल
नावी पिल्लै की जीवन यात्रा संघर्ष और साहस की बेमिसाल मिसाल है। 23 दिसंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका में एक भारतीय तमिल परिवार में जन्मीं नावी ने उस दौर में वकालत शुरू की, जब वहां रंगभेद का दौर चरम पर था। उन्होंने न सिर्फ नेल्सन मंडेला जैसे महान नेताओं और राजनीतिक बंदियों के अधिकारों के लिए अदालत में कानूनी लड़ाई लड़ी, बल्कि दक्षिण अफ्रीका के उच्च न्यायालय में पहली गैर-श्वेत महिला जज बनकर इतिहास भी रचा।
संयुक्त राष्ट्र में निभाई मानवाधिकारों के रक्षक की भूमिका
कानून के क्षेत्र में उनकी निष्पक्षता और दूरदर्शिता को देखते हुए उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ी जिम्मेदारियां मिलीं। वर्ष 2008 से 2014 तक उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त (UN High Commissioner for Human Rights) के रूप में अपनी सेवाएं दीं। नोबेल समिति के अनुसार, युद्ध अपराधों, मानवाधिकार हनन और महिलाओं के अधिकारों के पक्ष में फैसले देकर उन्होंने दुनिया भर में कानून का शासन स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
शांति और निष्पक्ष न्याय का एक सशक्त संदेश
नोबेल समिति ने उनके वैश्विक कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि नावी पिल्लै का पूरा जीवन शांति और समानता की दिशा में एक स्पष्ट संदेश देता है। पिछले वर्ष यानी 2025 में यह पुरस्कार वेनेजुएला की नेता मारिया कोरिना माचाडो को मिला था, और इस बार नावी पिल्लै का चयन दुनिया भर में मानवाधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता को और मजबूत करता है। उनकी यह उपलब्धि भावी पीढ़ियों को अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की प्रेरणा देती रहेगी।
Read More-10 अक्टूबर को होने वाले CJP प्रदर्शन के सपोर्ट में उतरे केजरीवाल, कहा- ‘ मैं भी जंतर-मंतर पर जाकर…’







