बरसाना के प्रसिद्ध संत रमेश बाबा का 90 वर्ष की उम्र में 6 अक्टूबर 2026 को निधन हो गया। ब्रज की धार्मिक और संत परंपरा में उनके योगदान को देखते हुए उनके निधन की खबर से बरसाना, वृंदावन और गोवर्धन समेत पूरे ब्रज क्षेत्र में शोक की लहर है। भक्त उन्हें राधारानी की भक्ति, संत जीवन और ब्रज सेवा के लिए विशेष सम्मान देते थे। उनके देहावसान की खबर फैलते ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु बरसाना स्थित उनके आश्रम पहुंचने लगे। सोशल मीडिया पर भी लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं और उनके जीवन से जुड़ी यादें साझा कर रहे हैं।
15 साल की उम्र में पहुंचे थे ब्रज, फिर यहीं बना लिया जीवन
रमेश बाबा का जन्म 1938 में प्रयागराज में हुआ था। बताया जाता है कि करीब 15 वर्ष की उम्र में यानी 1953 में उन्होंने ब्रज की ओर रुख किया और इसके बाद उनका जीवन इसी भूमि की सेवा में बीतता चला गया। वह बरसाना छोड़कर बाहर जाने के लिए भी बहुत कम तैयार होते थे। बरसाना के गहवर वन क्षेत्र स्थित मान मंदिर को उन्होंने अपना प्रमुख निवास बनाया। देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु उनके दर्शन और आशीर्वाद के लिए बरसाना पहुंचते थे। उनके सरल संत जीवन और ब्रज के प्रति समर्पण ने उन्हें बड़ी संख्या में लोगों के बीच श्रद्धा का केंद्र बना दिया था।
गौसेवा से लेकर पर्यावरण संरक्षण तक, उठाई कई आवाजें
रमेश बाबा ने सिर्फ धार्मिक जीवन तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि ब्रज के प्राकृतिक और सामाजिक संरक्षण के लिए भी लंबे समय तक काम किया। उन्होंने बरसाना में ‘माता जी गौशाला’ की स्थापना की, जहां बड़ी संख्या में निराश्रित और वृद्ध गायों की सेवा की जाती है। इसके अलावा उन्होंने ब्रज की पहाड़ियों और जंगलों को बचाने के लिए अभियान चलाए। यमुना की स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी उन्होंने कई आंदोलनों और पदयात्राओं में सक्रिय भूमिका निभाई। उनके प्रयासों को ब्रज सेवा और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना गया।
पद्म श्री से सम्मानित संत, निधन से भक्तों में गहरा शोक
ब्रज सेवा, गौसेवा और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए रमेश बाबा को पद्म श्री सम्मान से नवाजा गया था। आश्रम से जुड़े लोगों के मुताबिक, उनका पूरा जीवन ब्रजभूमि, गौसेवा और राधारानी की भक्ति के लिए समर्पित रहा। 6 अक्टूबर को मान मंदिर में उनके ब्रह्मलीन होने की खबर के बाद उनके अनुयायियों में गहरी भावुकता है। बरसाना के साथ-साथ वृंदावन और गोवर्धन में भी संत समाज और भक्त उनके निधन पर शोक व्यक्त कर रहे हैं। उनके जाने से ब्रज ने एक ऐसे संत को खो दिया, जिन्होंने आध्यात्मिक जीवन के साथ प्रकृति और गौसेवा को भी अपने जीवन का उद्देश्य बनाया।








