‘वंदे मातरम’ पर फिर क्यों मचा विवाद? जानिए मुसलमानों को किस बात पर है आपत्ति

Vande Mataram Controversy: संसद से राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 पास होने के बाद ‘वंदे मातरम’ को लेकर एक बार फिर बहस शुरू हो गई है। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी समेत कई मुस्लिम नेताओं ने इस पर अपनी राय रखी है। उनका कहना है कि इस्लाम में इबादत सिर्फ अल्लाह की की जाती है, इसलिए किसी और की पूजा या वंदना करना उनकी धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ है। वहीं, दूसरी ओर कई लोग ‘वंदे मातरम’ को देशभक्ति और राष्ट्रीय सम्मान का प्रतीक मानते हैं। इसी वजह से यह मुद्दा अब राजनीति और धर्म दोनों से जुड़ गया है।

मुसलमानों को ‘वंदे मातरम’ से क्यों है आपत्ति?

‘वंदे मातरम’ गीत बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था। इस गीत के कुल छह छंद हैं। आज राष्ट्रीय गीत के रूप में सिर्फ पहले दो छंद ही गाए जाते हैं। मुस्लिम नेताओं का कहना है कि बाद के कुछ छंदों में भारत माता की तुलना देवी दुर्गा और लक्ष्मी से की गई है। इस्लाम के अनुसार इबादत केवल अल्लाह की होती है, इसलिए ऐसे शब्दों को बोलना उनकी धार्मिक मान्यता के खिलाफ माना जाता है। उनका कहना है कि उन्हें देश से या राष्ट्रीय सम्मान से कोई परेशानी नहीं है, लेकिन धार्मिक विश्वास के खिलाफ किसी चीज़ को अनिवार्य नहीं बनाया जाना चाहिए।

संविधान क्या कहता है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 हर नागरिक को अपने धर्म को मानने और उसका पालन करने की आजादी देता है। इसी आधार पर कुछ मुस्लिम संगठन कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति को उसकी धार्मिक मान्यता के खिलाफ कोई काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। वहीं, ‘वंदे मातरम’ का समर्थन करने वाले लोगों का कहना है कि यह देश की आजादी के आंदोलन से जुड़ा हुआ गीत है और इसका सम्मान हर नागरिक को करना चाहिए। इसी वजह से इस मुद्दे पर अलग-अलग राय सामने आ रही है।

आगे क्या हो सकता है?

नया कानून आने के बाद इस विवाद ने फिर से जोर पकड़ लिया है। राजनीतिक दल, धार्मिक संगठन और कई सामाजिक संस्थाएं अपने-अपने तर्क दे रहे हैं। आने वाले समय में इस मुद्दे पर अदालत या सरकार की ओर से कोई नई स्पष्टता सामने आ सकती है। फिलहाल इतना साफ है कि एक पक्ष इसे देशभक्ति का प्रतीक मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे अपनी धार्मिक मान्यताओं से जोड़कर देखता है। ऐसे में यह बहस अभी आगे भी जारी रहने की संभावना है।

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