बेटियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, समाज को दिया सख्त संदेश

कन्या भ्रूण हत्या और घटते लिंगानुपात को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि आज भी समाज के कई हिस्सों में बेटियों को लेकर पुरानी और संकीर्ण सोच मौजूद है, जिसके कारण ऐसे मामलों को रोकने के लिए कड़े कानूनों की जरूरत बनी हुई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक समाज में बेटा-बेटी को बराबरी का दर्जा देने की सोच पूरी तरह विकसित नहीं होती, तब तक पीसीपीएनडीटी (PCPNDT) कानून का सख्ती से पालन होना जरूरी है। अदालत ने यह टिप्पणी एक मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें एक डॉक्टर की याचिका पर फैसला सुनाया गया। कोर्ट ने कहा कि कानून का उद्देश्य केवल अपराध रोकना नहीं, बल्कि बेटियों के जन्म के अधिकार की रक्षा करना भी है।

क्यों बनाया गया था PCPNDT कानून?

अदालत ने अपने फैसले में याद दिलाया कि पीसीपीएनडीटी अधिनियम वर्ष 1994 में लागू किया गया था। इस कानून का मुख्य उद्देश्य गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग पता लगाने और उसके आधार पर भ्रूण हत्या जैसी गैरकानूनी गतिविधियों को रोकना है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वर्षों से सरकारें ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियान चला रही हैं, लेकिन यह भी सच है कि आज भी समाज में जागरूकता की जरूरत है। अदालत ने कहा कि यदि आजादी के इतने वर्षों बाद भी बेटियों के अधिकारों की रक्षा के लिए लगातार अभियान चलाने पड़ रहे हैं, तो यह इस बात का संकेत है कि समाज को अभी लंबा सफर तय करना है। कोर्ट ने कहा कि बेटियों को समान अवसर और सम्मान देना केवल कानून की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है।

लिंगानुपात के आंकड़ों पर भी जताई चिंता

सुप्रीम Court ने देश में घटते लिंगानुपात के आंकड़ों का भी जिक्र किया। अदालत ने कहा कि पिछले कई दशकों के आंकड़े बताते हैं कि बेटियों की संख्या में गिरावट चिंता का विषय रही है। हालांकि हाल के वर्षों में कुछ सुधार देखने को मिला है, लेकिन कई क्षेत्रों में स्थिति अब भी संतोषजनक नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यह केवल आंकड़ों का मामला नहीं है, बल्कि समाज की मानसिकता का भी सवाल है। यदि बेटियों को जन्म से पहले ही दुनिया में आने का मौका नहीं मिलेगा, तो समानता और विकास की बातें अधूरी रह जाएंगी। अदालत ने कहा कि किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह महिलाओं और बेटियों को कितना सम्मान देता है।

सोच बदलेगी तो कानून की जरूरत भी कम होगी

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भविष्य में ऐसा समय जरूर आना चाहिए जब बेटियों की सुरक्षा के लिए विशेष कानूनों की जरूरत न पड़े। लेकिन जब तक समाज में पूरी तरह समानता की भावना विकसित नहीं होती, तब तक ऐसे कानून जरूरी बने रहेंगे। अदालत ने यह भी कहा कि बेटियों को बोझ नहीं, बल्कि परिवार और समाज की ताकत के रूप में देखा जाना चाहिए। फैसले के दौरान न्यायालय ने भारतीय संस्कृति और साहित्य में महिलाओं के सम्मान का उल्लेख करते हुए समाज को सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की। कोर्ट का मानना है कि कानून अपना काम कर सकता है, लेकिन वास्तविक बदलाव तब आएगा जब लोगों की सोच बदलेगी और बेटा-बेटी में कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

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