Wednesday, January 14, 2026

धर्मस्थल में प्रवेश से इनकार करने वाले ईसाई अधिकारी की बर्खास्तगी पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, सेना के अनुशासन को बताया सर्वोपरि 

भारतीय सेना के ईसाई अधिकारी लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसन को रेजिमेंट के धर्मस्थल में प्रवेश से इनकार करने पर बर्खास्त करने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह सही ठहराया है। कोर्ट ने कहा कि सेना में अनुशासन सर्वोपरि होता है और इसकी अवहेलना किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जा सकती। सैमुअल को मार्च 2021 में सेवा से बिना पेंशन और ग्रेच्युटी के बर्खास्त किया गया था। लंबे कानूनी संघर्ष के बाद उनका मामला सर्वोच्च अदालत पहुँचा, जहाँ उनका दावा खारिज हो गया।

रेजिमेंट में नियुक्ति और धार्मिक परेड का विवाद

सैमुअल कमलेसन वर्ष 2017 में थर्ड कैवेलरी रेजिमेंट में लेफ्टिनेंट के पद पर भर्ती हुए थे। यह रेजिमेंट मुख्य रूप से सिख, जाट और राजपूत सैनिकों से बनी है। रेजिमेंट की परंपरा के मुताबिक हर सप्ताह धार्मिक परेड होती है, जिसमें सभी सैनिक निर्धारित धर्मस्थल में जाते हैं। सैमुअल को स्क्वाड्रन बी में ट्रूप लीडर बनाया गया था, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए धार्मिक परेड में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया कि रेजिमेंट में केवल मंदिर और गुरुद्वारा हैं और एक ईसाई होने के नाते वह इनमें प्रवेश नहीं कर सकते।

समझाने की कोशिशें नाकाम, पादरी और वरिष्ठ अफसर भी आए आगे

कई महीनों तक वरिष्ठ अधिकारी सैमुअल को समझाने की कोशिश करते रहे कि धार्मिक परेड किसी खास धर्म का पालन नहीं, बल्कि सैन्य अनुशासन का हिस्सा है। इस मामले में अन्य ईसाई अधिकारी भी आगे आए और उन्होंने बताया कि यह प्रक्रिया केवल प्रतीकात्मक है और इससे किसी भी धर्म की आस्था को नुकसान नहीं पहुँचता। यहां तक कि स्थानीय ईसाई पादरी ने भी उन्हें समझाने की कोशिश की कि सामूहिक धर्मस्थल में जाने से उनकी धार्मिक मान्यता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। बावजूद इसके, सैमुअल अपने निर्णय पर अड़े रहे।

सेना के अनुशासन को सर्वोपरि बताते हुए कोर्ट ने दिया अंतिम फैसला

लगातार निर्देशों की अवहेलना के बाद थल सेना प्रमुख के आदेश पर 3 मार्च 2021 को सैमुअल की सेवा समाप्त कर दी गई। उन्होंने इस कार्रवाई के खिलाफ कोर्ट का रुख किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि सेना में धार्मिक स्थल पर जाना किसी धार्मिक गतिविधि का हिस्सा नहीं, बल्कि यूनिट की एकता, परंपरा और अनुशासन का जरूरी तत्व है। अदालत का मानना था कि बार-बार समझाए जाने के बावजूद आदेश न मानना गंभीर अनुशासनहीनता है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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