Chhattisgarh High Court News: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने नाबालिग सौतेली बेटी से दुष्कर्म के मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दोषी व्यक्ति की 20 साल की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने साफ कहा कि यदि पीड़िता का बयान पूरे मामले में लगातार एक जैसा, स्पष्ट और भरोसेमंद हो, तो केवल उसी के आधार पर भी दोष साबित किया जा सकता है। कोर्ट ने माना कि ऐसे मामलों में हर बार मेडिकल रिपोर्ट या अतिरिक्त प्रत्यक्ष गवाह का होना जरूरी नहीं होता। न्यायालय ने कहा कि अदालत का सबसे बड़ा उद्देश्य उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों के आधार पर सच्चाई तक पहुंचना है। इसी वजह से ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा में किसी तरह की कानूनी कमी नहीं पाई गई और दोषी की अपील को खारिज कर दिया गया।
क्या था पूरा मामला?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 31 जुलाई 2024 को पीड़िता की मां ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि जब वह काम पर गई हुई थी, उसी दौरान आरोपी सौतेले पिता ने घर में मौजूद 13 वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म किया। मामले की जांच के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया और ट्रायल कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई। अदालत में पीड़िता ने पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी। सुनवाई के दौरान पेश किए गए साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी मानते हुए 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसके बाद दोषी ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी और सजा रद्द करने की मांग की।
मेडिकल रिपोर्ट का तर्क अदालत ने क्यों नहीं माना?
हाई कोर्ट में अपील के दौरान आरोपी ने दलील दी कि मेडिकल जांच में दुष्कर्म की स्पष्ट पुष्टि नहीं हुई और अभियोजन पक्ष के कुछ सबूतों में विरोधाभास भी थे। लेकिन अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि यौन अपराधों के मामलों में केवल मेडिकल रिपोर्ट ही अंतिम आधार नहीं होती। यदि पीड़िता का बयान स्वाभाविक, लगातार एक जैसा और विश्वास के योग्य हो, तो उसे मजबूत साक्ष्य माना जा सकता है। अदालत ने यह भी पाया कि ट्रायल के दौरान पीड़िता ने हर बार एक जैसी जानकारी दी और उसकी छोटी बहन के बयान से भी घटना की पुष्टि हुई। इन परिस्थितियों में अदालत को आरोपी की दलीलों में कोई दम नहीं लगा और ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही माना गया।
फैसले से मिला महत्वपूर्ण कानूनी संदेश
हाई कोर्ट के इस फैसले को नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी उदाहरण माना जा रहा है। अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि ऐसे संवेदनशील मामलों में पीड़िता की विश्वसनीय गवाही को हल्के में नहीं लिया जा सकता। यदि उसका बयान सुसंगत और भरोसेमंद हो, तो न्यायालय उसी के आधार पर दोष तय कर सकता है। कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है। वहीं, अदालत के इस निर्णय से यह संदेश भी गया है कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराध करने वालों के प्रति न्यायपालिका सख्त रुख अपनाए हुए है और दोष साबित होने पर कानून के अनुसार कड़ी सजा देने से पीछे नहीं हटेगी।
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