फांसी का फंदा पहनकर क्यों बैठीं आदिवासी महिलाएं? केन-बेतवा परियोजना के विरोध में बढ़ा आंदोलन

मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के खिलाफ आदिवासी परिवारों का विरोध लगातार बढ़ता जा रहा है। आंदोलन को 10 दिन हो चुके हैं, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकल पाया है। इसी बीच प्रभावित आदिवासी महिलाओं ने विरोध का नया तरीका अपनाया है। महिलाओं ने गले में फांसी का फंदा डालकर प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया और कहा कि अगर उन्हें न्याय और सही पुनर्वास नहीं मिल सकता, तो सरकार उन्हें इच्छामृत्यु की अनुमति दे दे। यह आंदोलन कूपी गांव के पास बराना नदी किनारे चल रहा है और बड़ी संख्या में ग्रामीण इसमें शामिल हैं।

घर, जमीन और रोजगार छिनने का डर

आंदोलन कर रहे लोगों का कहना है कि परियोजना की वजह से उन्हें अपने घर और खेत छोड़ने पड़ेंगे। उनका आरोप है कि कई परिवारों को अभी तक यह साफ नहीं बताया गया है कि उन्हें कहां बसाया जाएगा और उन्हें कितना मुआवजा मिलेगा। ग्रामीणों का कहना है कि उनकी रोजी-रोटी खेती और जंगल पर निर्भर है। अगर वे अपनी जमीन छोड़ देंगे तो उनके सामने जीवनयापन का संकट खड़ा हो जाएगा। कुछ लोगों का यह भी दावा है कि कई प्रभावित परिवारों के नाम सरकारी सूची में शामिल नहीं किए गए हैं, जिससे उन्हें मिलने वाली सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पाएगा।

 भूख हड़ताल पर बैठे आंदोलनकारी

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर पिछले कई दिनों से भूख हड़ताल पर हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि प्रशासन ने पहले उनकी मांगें मानने का भरोसा दिया था, लेकिन अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। उनका आरोप है कि कई परिवारों पर दबाव बनाया जा रहा है और उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। आंदोलन में शामिल लोगों का कहना है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होंगी, तब तक विरोध जारी रहेगा। वहीं, कुछ लोगों ने स्वास्थ्य खराब होने की भी बात कही है।

प्रशासन और ग्रामीणों के दावे अलग-अलग

जिला प्रशासन का कहना है कि प्रभावित लोगों से लगातार बातचीत की जा रही है। अधिकारियों के अनुसार सरकार ने पुनर्वास और राहत पैकेज को पहले से बेहतर बनाया है और कई मांगों पर कार्रवाई भी हुई है। लेकिन आंदोलन कर रहे लोगों का कहना है कि उन्हें अभी भी संतोषजनक समाधान नहीं मिला है। बता दें कि केन-बेतवा परियोजना देश की पहली बड़ी नदी जोड़ो योजना है। सरकार का दावा है कि इससे सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन में फायदा होगा। हालांकि प्रभावित परिवारों का कहना है कि विकास के साथ-साथ लोगों के अधिकारों और भविष्य की भी सुरक्षा होनी चाहिए। इसी मांग को लेकर उनका आंदोलन लगातार जारी है।

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