Tuesday, January 13, 2026

30 साल देश के नाम, जब वर्दी उतारकर गांव लौटे कैप्टन मनोज सिंह तो स्टेशन से गांव तक उमड़ पड़ा जनसैलाब

जब कोई सैनिक वर्षों तक सीमा पर देश की रक्षा कर अपने गांव लौटता है, तो वह सिर्फ अपने घर नहीं आता, बल्कि पूरे समाज के लिए गर्व का प्रतीक बन जाता है। बिहार के गया जिले के मानपुर प्रखंड की सोहेपुर पंचायत स्थित अमरा गांव में कुछ ऐसा ही दृश्य देखने को मिला, जब भारतीय सेना में 30 वर्षों तक सेवा देने के बाद कैप्टन मनोज सिंह गांव लौटे। उनकी वापसी की खबर मिलते ही गांव और आसपास के इलाकों में उत्साह की लहर दौड़ गई। गया रेलवे स्टेशन पर ही ग्रामीण, रिश्तेदार, युवा और बुजुर्ग बड़ी संख्या में जुट गए। फूल-मालाओं, तिरंगे और ढोल-नगाड़ों के साथ स्टेशन परिसर देशभक्ति के रंग में रंग गया। लोग ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम्’ के नारों के साथ अपने फौजी बेटे का स्वागत करते नजर आए। यह स्वागत किसी औपचारिक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था, बल्कि दिल से निकली उस भावना का प्रदर्शन था, जो हर उस व्यक्ति के लिए होती है जिसने अपना जीवन देश के नाम कर दिया हो।

20 किलोमीटर लंबा जुलूस बना देशभक्ति का उत्सव

गया स्टेशन से अमरा गांव तक करीब 20 किलोमीटर का सफर किसी आम यात्रा जैसा नहीं था। कारों और बाइकों की लंबी कतारें, हाथों में तिरंगा लिए युवा, ढोल-नगाड़ों की गूंज और देशभक्ति गीतों से पूरा रास्ता गूंजता रहा। जैसे-जैसे जुलूस आगे बढ़ता गया, रास्ते के गांवों और चौराहों पर लोग अपने-अपने घरों से बाहर निकलकर इस दृश्य को देखने लगे। कई जगहों पर लोगों ने फूल बरसाए, तो कहीं बुजुर्गों ने हाथ जोड़कर सम्मान प्रकट किया। यह जुलूस सिर्फ एक व्यक्ति के सम्मान का नहीं था, बल्कि भारतीय सेना के प्रति लोगों के भरोसे और सम्मान का प्रतीक बन गया। गांव पहुंचते-पहुंचते माहौल ऐसा हो गया मानो कोई राष्ट्रीय पर्व मनाया जा रहा हो। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर किसी के चेहरे पर गर्व साफ झलक रहा था कि उनका गांव देश की रक्षा करने वाले एक जांबाज सैनिक का घर है।

तीन दशकों की सेवा, कई बड़े अभियानों का हिस्सा

कैप्टन मनोज सिंह की सैन्य यात्रा केवल वर्षों की गिनती तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह देश के कई अहम और चुनौतीपूर्ण अभियानों का हिस्सा रहे। ऑपरेशन विजय से लेकर गलवान घाटी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में तैनाती और ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों में योगदान देकर उन्होंने देशसेवा की मिसाल पेश की। उनके साथियों और ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने हमेशा अपने कर्तव्य को सर्वोपरि रखा और कठिन परिस्थितियों में भी पीछे हटने के बजाय जिम्मेदारी निभाई। गांव के लोगों के लिए यह जानना गर्व की बात है कि उनका बेटा उन अभियानों में शामिल रहा, जिनका नाम देश की सैन्य इतिहास में दर्ज है। कैप्टन मनोज सिंह की यह यात्रा यह भी बताती है कि सेना में सेवा सिर्फ नौकरी नहीं होती, बल्कि एक ऐसा संकल्प होता है, जो इंसान के पूरे जीवन को दिशा देता है।

‘देशसेवा कभी रिटायर नहीं होती’, युवाओं को दिया संदेश

गांव पहुंचने के बाद आयोजित सादे लेकिन भावनात्मक कार्यक्रम में कैप्टन मनोज सिंह ने युवाओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि वर्दी जरूर उतर जाती है, लेकिन देश के प्रति जिम्मेदारी कभी खत्म नहीं होती। उन्होंने युवाओं से अनुशासन, ईमानदारी और मेहनत को जीवन का आधार बनाने की अपील की। उनका कहना था कि देश को मजबूत बनाने के लिए हर नागरिक का योगदान जरूरी है, चाहे वह सीमा पर हो या गांव-शहर में रहकर अपने कर्तव्य निभा रहा हो। उन्होंने यह भी कहा कि सेना में जाने का सपना देखने वाले युवाओं को धैर्य और समर्पण के साथ तैयारी करनी चाहिए। यह घर वापसी सिर्फ एक सेवानिवृत्त अधिकारी की कहानी नहीं थी, बल्कि उस सोच की जीत थी जो कहती है कि सच्ची देशभक्ति पद या वर्दी की मोहताज नहीं होती। अमरा गांव के लिए यह दिन लंबे समय तक यादगार रहेगा, जब उनका फौजी बेटा इतिहास बनकर गांव लौटा।

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