बच्चे के जन्म पर सिर्फ मां नहीं… पिता को भी छुट्टी? सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी ने बदल दी बहस!

देश की सर्वोच्च अदालत Supreme Court of India ने एक अहम टिप्पणी करते हुए पितृत्व अवकाश (पैटरनिटी लीव) को लेकर बड़ा संकेत दिया है। कोर्ट ने कहा कि बच्चे के जन्म के बाद शुरुआती समय केवल मां ही नहीं, बल्कि पिता के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में यह जरूरी है कि पिता को भी बच्चे के साथ समय बिताने का अवसर मिले।

अदालत ने केंद्र सरकार से यह भी कहा कि वह पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाने के लिए कानून बनाने पर विचार करे। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद देशभर में इस मुद्दे पर नई बहस शुरू हो गई है।

‘मां के साथ पिता की भूमिका भी उतनी ही जरूरी’

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने साफ कहा कि बच्चे के विकास में मां की भूमिका महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन पिता की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि माता-पिता बनना किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह दोनों की साझा जिम्मेदारी है।

कोर्ट ने कहा कि बच्चे के भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक विकास में पिता की भागीदारी भी उतनी ही अहम होती है। अगर पिता को शुरुआत में बच्चे के साथ समय बिताने का मौका नहीं मिलता, तो यह परिवार के लिए एक महत्वपूर्ण अनुभव छूट सकता है।

गोद लेने के मामले में भी दिया बड़ा फैसला

यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें गोद लेने वाली मां को मातृत्व अवकाश देने से जुड़ा नियम चुनौती के दायरे में था। कोर्ट ने इस नियम को खारिज करते हुए कहा कि गोद लेने वाली मां को भी 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलना चाहिए, चाहे बच्चे की उम्र कुछ भी हो।

अदालत ने कहा कि बच्चे के साथ शुरुआती समय हर माता-पिता के लिए जरूरी होता है, चाहे बच्चा जन्म से जुड़ा हो या गोद लिया गया हो। इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया कि कोर्ट बच्चों के समग्र विकास और परिवार की जरूरतों को प्राथमिकता दे रहा है।

लैंगिक समानता को मिलेगा बढ़ावा

कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि पितृत्व अवकाश से समाज में लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा। लंबे समय से यह धारणा बनी हुई है कि बच्चों की देखभाल केवल मां की जिम्मेदारी होती है, लेकिन यह सोच बदलनी जरूरी है।

अगर पिता को भी अवकाश मिलेगा, तो वे बच्चे की देखभाल में सक्रिय भूमिका निभा पाएंगे और परिवार की जिम्मेदारियां बेहतर तरीके से साझा कर सकेंगे। इससे न केवल मां को सहारा मिलेगा, बल्कि कार्यस्थल और समाज में समानता की भावना भी मजबूत होगी।

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