क्या सच में अमेरिका देगा ईरान को 300 अरब डॉलर? ट्रंप के बयान ने मचाया बड़ा बवाल, समझौते पर उठे नए सवाल

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ चल रही कथित समझौता प्रक्रिया को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने और न रखने पर सहमति जताई है। हालांकि, इसी के साथ उन्होंने उन खबरों को पूरी तरह खारिज कर दिया जिनमें दावा किया जा रहा था कि अमेरिका ईरान को 300 अरब डॉलर देने जा रहा है। ट्रंप ने इसे “फर्जी खबर” बताया और आरोप लगाया कि इस तरह की अफवाहें डेमोक्रेट्स द्वारा फैलाई जा रही हैं। उनके इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस समझौते को लेकर चर्चा और तेज हो गई है।

समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर का दावा

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच एक शुरुआती समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए हैं। इसमें अमेरिकी प्रतिनिधियों के साथ उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेरी गालीबाफ के शामिल होने की बात कही गई है। इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच तनाव कम करना और कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत को आगे बढ़ाना बताया जा रहा है। हालांकि, अभी तक इस डील को लेकर कोई आधिकारिक और पूरी तरह से पुष्टि करने वाला बयान सामने नहीं आया है, जिससे स्थिति काफी अस्पष्ट बनी हुई है।

होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने पर भी बनी सहमति की चर्चा

रिपोर्ट्स में यह भी कहा जा रहा है कि इस संभावित समझौते के तहत होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को दोबारा खोलने पर सहमति बन सकती है। यह वही महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, जिससे दुनिया के बड़े हिस्से का तेल व्यापार होता है। हाल के तनाव के चलते इस क्षेत्र में अस्थिरता बनी हुई थी, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर असर पड़ा। अगर यह समझौता आगे बढ़ता है तो बाजार को स्थिर करने में समय लग सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिति पूरी तरह सामान्य होने में कई महीने भी लग सकते हैं, क्योंकि इस दौरान आपूर्ति श्रृंखला पर गहरा असर पड़ा है।

इजरायल और ईरान के मतभेद से बढ़ी जटिलता

इस पूरे समझौते को लागू करने में सबसे बड़ी चुनौती क्षेत्रीय तनाव को बताया जा रहा है। इजरायल ने स्पष्ट किया है कि वह लेबनान में कुछ इलाकों से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है, जहां उसका संघर्ष हिज़्बुल्लाह के साथ जारी है। चूंकि इजरायल इस समझौते का हिस्सा नहीं है, इसलिए स्थिति और जटिल हो गई है। वहीं ईरान का कहना है कि किसी भी अंतिम समझौते में क्षेत्रीय संघर्षों का समाधान शामिल होना चाहिए। ईरान के विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा है कि अमेरिका के साथ अविश्वास की जड़ें दशकों पुरानी हैं और इसे खत्म करना आसान नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि 1953 के ऐतिहासिक घटनाक्रम के कारण दोनों देशों के बीच भरोसा अभी भी बहुत कमजोर है।

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