CJI को हटाने पर केंद्र का बड़ा बचाव, चुनाव आयुक्त चयन प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस

मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर देश में संवैधानिक बहस तेज हो गई है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट कहा है कि चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश यानी CJI की मौजूदगी कोई संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है। सरकार का कहना है कि न्यायपालिका के प्रतिनिधि को चयन पैनल में शामिल करना संसद का एक विधायी विकल्प हो सकता है, लेकिन संविधान इसकी बाध्यता तय नहीं करता। केंद्र ने अदालत में दाखिल हलफनामे में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324(2) में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए किसी विशेष चयन प्रक्रिया का उल्लेख नहीं किया गया है। ऐसे में संसद को यह अधिकार है कि वह कानून बनाकर नियुक्ति की प्रक्रिया तय करे। दरअसल, 2023 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर निर्देश दिया था कि जब तक संसद नया कानून नहीं बनाती, तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और CJI वाली समिति के जरिए की जाए। इसके बाद केंद्र सरकार नया कानून लेकर आई, जिसमें CJI की जगह एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया। अब इसी कानून को चुनौती दी गई है।

सरकार ने कहा- न्यायपालिका की मौजूदगी जरूरी मानना गलत धारणा

केंद्र सरकार ने सुप्रीम Court में अपने हलफनामे में कहा कि यह मान लेना गलत होगा कि किसी संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता तभी सुनिश्चित हो सकती है, जब चयन समिति में न्यायपालिका का प्रतिनिधि शामिल हो। सरकार का तर्क है कि पिछले सात दशकों से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कार्यपालिका के जरिए होती रही है और इस दौरान कभी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल नहीं उठे। केंद्र ने कहा कि केवल इस आधार पर कि नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका की भूमिका ज्यादा है, यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं कि आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित होगी। हलफनामे में यह भी कहा गया कि संसद द्वारा पारित कानून पूरी तरह वैध है और इसे किसी “गुप्त मंशा” या “कपटपूर्ण उद्देश्य” के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती। सरकार ने जोर देकर कहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वे निष्पक्षता और जनहित को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेंगे। ऐसे में केवल चयन समिति की संरचना को लेकर संदेह पैदा करना उचित नहीं है। केंद्र ने अदालत से कहा कि यह बहस इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि “बेहतर प्रक्रिया” क्या हो सकती है, बल्कि यह देखा जाना चाहिए कि संसद द्वारा बनाया गया कानून संवैधानिक दायरे में है या नहीं।

विपक्ष और याचिकाकर्ताओं के आरोप खारिज

सरकार ने अपने जवाब में यह भी कहा कि 2023 में लाया गया कानून पहले की तुलना में ज्यादा लोकतांत्रिक और समावेशी व्यवस्था प्रदान करता है। नए कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और एक केंद्रीय मंत्री शामिल होते हैं। केंद्र का कहना है कि इससे नियुक्ति प्रक्रिया में सहयोगात्मक दृष्टिकोण मजबूत हुआ है। सरकार ने यह भी दावा किया कि अब तक नियुक्त किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त की योग्यता और निष्पक्षता को लेकर गंभीर आरोप सामने नहीं आए हैं। हलफनामे में कहा गया कि याचिकाकर्ताओं की ओर से लगाए गए आरोप केवल आशंकाओं और अटकलों पर आधारित हैं। सरकार ने कहा कि बिना किसी ठोस प्रमाण के यह कहना कि नया कानून चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को कमजोर करेगा, पूरी तरह अनुचित है। केंद्र ने यह भी स्पष्ट किया कि संसद को कानून बनाने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है और न्यायपालिका केवल इस आधार पर किसी कानून को खारिज नहीं कर सकती कि उसके पीछे राजनीतिक उद्देश्य होने का आरोप लगाया गया है। सरकार ने अदालत से कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद द्वारा पारित कानूनों को संवैधानिक सम्मान मिलना चाहिए।

चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर क्यों बढ़ी बहस

मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर यह मामला अब देश में संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और शक्तियों के संतुलन से जुड़ी बड़ी बहस बन चुका है। विपक्षी दलों और कई याचिकाकर्ताओं का मानना है कि चयन समिति से CJI को हटाने से कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ सकता है और इससे चुनाव आयोग की निष्पक्षता प्रभावित होने की आशंका है। वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में निर्वाचित सरकार की भूमिका को संदेह की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का आने वाला फैसला भविष्य में संवैधानिक संस्थाओं की नियुक्ति प्रक्रिया पर बड़ा असर डाल सकता है। इस मामले में अदालत को यह तय करना होगा कि क्या संसद द्वारा बनाया गया नया कानून संविधान की भावना के अनुरूप है या नहीं। फिलहाल केंद्र सरकार अपने रुख पर कायम है और उसका कहना है कि न्यायपालिका की उपस्थिति को संवैधानिक आवश्यकता बताना उचित नहीं है। आने वाले दिनों में इस मामले की सुनवाई पर पूरे देश की नजरें टिकी रहेंगी, क्योंकि इसका असर चुनाव आयोग जैसी महत्वपूर्ण संस्था की कार्यप्रणाली और स्वतंत्रता पर पड़ सकता है।

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