राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है, जब बाड़मेर जिले के शिव से निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी की सुरक्षा में कटौती कर दी गई। राज्य सरकार के निर्देश पर हुई इस कार्रवाई के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। पहले जहां भाटी को चार सुरक्षा कर्मी (पीएसओ) दिए गए थे, वहीं अब अतिरिक्त सुरक्षा हटाकर संख्या कम कर दी गई है। इस फैसले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, खासकर ऐसे समय में जब पहले उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलने की बात सामने आ चुकी है। सुरक्षा हटाने के पीछे प्रशासन का तर्क समीक्षा प्रक्रिया बताया जा रहा है, लेकिन इसके समय और परिस्थितियों ने इसे विवादों में ला दिया है।
भाटी का आरोप—‘राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश’
सुरक्षा में कमी के बाद विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि यह कदम उन्हें दबाने की एक कोशिश है, लेकिन वे किसी भी तरह के दबाव में आने वाले नहीं हैं। भाटी ने अपने बयान में कहा, “जाको राखे सईया मार सके न कोय,” और यह भी जोड़ा कि उनकी ताकत जनता है, न कि सरकारी सुरक्षा। उन्होंने साफ किया कि वे जनता के मुद्दों को उठाते रहेंगे, चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों। उनके इस बयान से साफ है कि वे इस फैसले को केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक नजरिए से देख रहे हैं। भाटी का यह भी कहना है कि जनता सब समझ रही है कि कब और क्यों सुरक्षा दी जाती है और कब वापस ली जाती है।
पहले भी मिल चुकी हैं धमकियां
जानकारी के अनुसार, वर्ष 2023 में विधायक बनने के बाद भाटी को शुरुआत में एक पीएसओ दिया गया था। बाद में जब उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की, तो उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं। इसके चलते उनकी सुरक्षा बढ़ाकर दो पीएसओ कर दी गई थी। जनवरी 2025 में एक पीएसओ हटा लिया गया, लेकिन इसके बाद फिर से खतरे की आशंका जताई गई और खुफिया रिपोर्ट में भी सुरक्षा जोखिम की बात सामने आई। इसी के चलते मार्च 2025 में उनकी सुरक्षा बढ़ाकर चार पीएसओ कर दी गई थी, जिसमें दो कमांडो भी शामिल थे। अब एक बार फिर सुरक्षा में कटौती ने पुराने सवालों को फिर से जीवित कर दिया है कि आखिर खतरे के आकलन का आधार क्या है।
फैसले पर सियासी बहस तेज
सुरक्षा हटाने के फैसले के बाद भाटी के समर्थकों में नाराजगी देखी जा रही है। उनका मानना है कि यह निर्णय गलत समय पर लिया गया है और इससे विधायक की सुरक्षा पर सवाल खड़े होते हैं। वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस मामले ने राज्य की राजनीति को एक नया मुद्दा दे दिया है, जहां सरकार के फैसलों की निष्पक्षता पर बहस हो रही है। प्रशासन ने इसे सामान्य प्रक्रिया बताया है, लेकिन भाटी के आरोपों ने इसे एक बड़ा राजनीतिक विवाद बना दिया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह मुद्दा केवल सुरक्षा तक सीमित रहता है या फिर व्यापक राजनीतिक बहस का रूप ले लेता है।
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