संसद के मानसून सत्र में पब्लिक एग्जामिनेशन (संशोधन) विधेयक-2026 पर चर्चा के दौरान राज्यसभा में उस समय माहौल गरमा गया, जब कांग्रेस अध्यक्ष और विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने अपने भाषण में मनुस्मृति का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पेपर लीक की घटनाओं से लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ है और केवल सख्त कानून बनाने से समस्या खत्म नहीं होगी। खरगे ने सरकार से सवाल किया कि जब विपक्ष ने 2024 में ही कड़े कानून की मांग की थी, तो उस समय इसे लागू क्यों नहीं किया गया। उन्होंने छात्र आंदोलन और परीक्षा व्यवस्था को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा।
मनुस्मृति का उल्लेख होते ही सदन में शुरू हुआ हंगामा
अपने भाषण के दौरान खरगे ने मनुस्मृति का हवाला देते हुए कुछ पंक्तियों का जिक्र किया और कहा कि सरकार की नीतियां उन्हें उस सोच की याद दिलाती हैं। उनके इस बयान पर सत्ता पक्ष के सांसदों ने कड़ी आपत्ति जताई। सदन में शोर-शराबा शुरू हो गया और राज्यसभा के उपसभापति ने भी पूछा कि इस विधेयक का मनुस्मृति से क्या संबंध है। हालांकि, इस सवाल पर खरगे ने कोई अलग जवाब नहीं दिया और अपना भाषण समाप्त कर दिया। इसके बाद सदन में कुछ देर तक तीखी बहस का माहौल बना रहा।
जेपी नड्डा और सुधांशु त्रिवेदी ने किया पलटवार
खरगे के बयान के बाद सदन के नेता जेपी नड्डा ने कहा कि इस तरह के बयान समाज में गलत संदेश दे सकते हैं और इससे विवाद की स्थिति बन सकती है। उन्होंने दावा किया कि मनुस्मृति को लेकर जो बातें कही गईं, वे तथ्यों से मेल नहीं खातीं। इसके बाद भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने भी अपनी बात रखते हुए कहा कि मनुस्मृति के मूल पाठ और उसके अलग-अलग अनुवादों को लेकर कई तरह की व्याख्याएं मौजूद हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस विषय पर ऐतिहासिक संदर्भों को सही तरीके से समझना जरूरी है।
पेपर लीक बिल से हटकर बहस का केंद्र बना बयान
एंटी पेपर लीक बिल पर शुरू हुई चर्चा आखिरकार राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की ओर मुड़ गई। विपक्ष ने परीक्षा व्यवस्था, छात्र आंदोलन और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए, जबकि सत्ता पक्ष ने मनुस्मृति पर दिए गए बयान को लेकर विरोध दर्ज कराया। संसद में हुई इस बहस के बाद एक बार फिर शिक्षा, परीक्षा सुधार और राजनीतिक बयानबाजी चर्चा का विषय बन गए हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और तेज होने की संभावना है।
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