“ये हिंदू राष्ट्र है, सेक्युलर नाम की कोई चीज़ नहीं…”नितेश राणे के बयान से गरमाई सियासत

महाराष्ट्र सरकार में मंत्री नितेश राणे एक बार फिर अपने बयानों को लेकर सुर्खियों में हैं। नागपुर में आयोजित हिंदू सम्मेलन के दौरान उन्होंने भारत को “हिंदू राष्ट्र” बताते हुए कहा कि देश में 90 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की है और प्राथमिकता भी हिंदुओं को ही दी जानी चाहिए। उन्होंने संविधान में “सेक्युलर” शब्द के संदर्भ को लेकर दावा किया कि डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा तैयार किए गए शुरुआती मसौदे में यह शब्द नहीं था और बाद में इसे जोड़ा गया। राणे के इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है, जहां एक तरफ समर्थक इसे विचारधारात्मक स्पष्टता बता रहे हैं, वहीं विपक्ष इसे संविधान की भावना के खिलाफ बता रहा है।

‘चेतावनी’ और ‘कानून-व्यवस्था’ पर तीखे तेवर

अपने भाषण में नितेश राणे ने कानून-व्यवस्था को लेकर सख्त लहजे का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि अगर कोई हिंदुओं की ओर “गलत नजर” से देखेगा तो सरकार कार्रवाई करेगी। बीते संदर्भों का जिक्र करते हुए उन्होंने कथित रूप से भड़काऊ टिप्पणी की और पुलिस की भूमिका को लेकर भी सख्त शब्दों का प्रयोग किया। राणे ने कहा कि त्योहारों के समय हिंदू समाज पर पाबंदियों की बात की जाती है, जबकि अन्य समुदायों से वैसी अपेक्षाएं नहीं रखी जातीं। इस हिस्से में उन्होंने होली, दिवाली और रमजान का जिक्र करते हुए आपसी “समझदारी” की अपील भी की, लेकिन साथ ही चेतावनी भरे शब्दों ने विवाद को और गहरा कर दिया।

मदरसों पर बयान, इतिहास और पहचान की राजनीति

मंत्री ने अपने संबोधन में मदरसों को लेकर भी सवाल उठाए और राज्य सरकार से इस विषय पर कदम उठाने की बात कही। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ संस्थानों में किन ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की तस्वीरें लगाई जाती हैं, यह पहचान की राजनीति का हिस्सा है। इस दौरान उन्होंने टीपू सुल्तान का नाम लेते हुए विवादित टिप्पणी की। साथ ही उन्होंने संविधान बनाम धार्मिक ग्रंथों की बहस का जिक्र किया, जिस पर विपक्षी दलों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे बयान चुनावी माहौल में ध्रुवीकरण को तेज करते हैं और सामाजिक ताने-बाने पर असर डालते हैं।

शीर्ष नेतृत्व का जिक्र, ‘घर वापसी’ कानून की मांग

अपने भाषण के अंतिम हिस्से में नितेश राणे ने केंद्र और राज्य के शीर्ष नेतृत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि यह दौर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और देवेंद्र फडणवीस के प्रशासन का है। उन्होंने मुख्यमंत्री से “घर वापसी” के लिए कानून लाने की मांग करने की बात भी कही। इस बयान के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में प्रतिक्रियाओं का दौर तेज हो गया है। विपक्ष ने इसे असंवैधानिक और समाज को बांटने वाला बताया, जबकि सत्तारूढ़ खेमे के कुछ नेताओं ने इसे व्यक्तिगत राय करार दिया। अब सवाल यह है कि क्या ये बयान केवल सियासी बयानबाज़ी हैं या आने वाले दिनों में सरकार की नीति पर भी इनका असर दिखेगा—यही सस्पेंस राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

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