मध्य प्रदेश के दतिया से कांग्रेस के विधायक Rajendra Bharti को एक पुराने सहकारी बैंक घोटाले में बड़ा झटका लगा है। दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने राजेंद्र भारती और उनके सह-आरोपी Raghuveer Sharan Prajapati को तीन साल के कारावास की सजा सुनाई है। इस मामले में आरोप हैं कि दोनों ने वित्तीय अनियमितताओं और फर्जीवाड़े के जरिए बैंक को नुकसान पहुँचाया। अदालत ने दोनों को अंतरिम जमानत देते हुए 30 दिन के भीतर अपील करने का अधिकार भी दिया है। यह फैसला मध्य प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में चर्चा का विषय बन गया है, क्योंकि इससे दतिया से विधायक की विधायकी पर भी खतरा मंडरा रहा है।
एफडी घोटाले की कहानी और आरोप
मामला 1998 से शुरू हुआ, जब राजेंद्र भारती की मां सावित्री श्याम ने दतिया के जिला सहकारी ग्रामीण विकास बैंक में 10 लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) कराई थी। इस एफडी पर 13.5 प्रतिशत की उच्च ब्याज दर थी और अवधि तीन साल तय की गई थी। उस समय राजेंद्र भारती बैंक के बोर्ड के चेयरमैन थे। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि भारती ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए एफडी की अवधि पहले दस साल और बाद में पंद्रह साल कर दी। इस दौरान उच्च ब्याज दर लागू रखी गई, जिससे लाभ सीधे उनके परिवार को हुआ और बैंक को नुकसान उठाना पड़ा।
फर्जी दस्तावेज और ऑडिट में खुलासा
जांच में सामने आया कि एफडी अवधि बढ़ाने के लिए बैंक के अहम दस्तावेजों जैसे लेजर बुक, एफडी काउंटर स्लिप और रसीदों में फर्जी हस्ताक्षर और छेड़छाड़ की गई। आरोप है कि 1999 से 2011 के बीच राजेंद्र भारती और रघुवीर शरण प्रजापति ने मिलकर बैंक के रिकॉर्ड में छेड़छाड़ की। यह मामला तब प्रकाश में आया जब भारती बैंक बोर्ड से हट गए और ऑडिट टीम ने गंभीर अनियमितताओं का पता लगाया। इसके बाद सहकारिता विभाग ने शिकायत दर्ज कराई और मामला अदालत तक गया। कोर्ट ने जांच और सबूतों के आधार पर दोनों को दोषी ठहराया और तत्काल तिहाड़ जेल में भेजने के आदेश भी दिए थे, हालांकि बाद में उन्हें जमानत मिल गई।
राजनीतिक और कानूनी प्रभाव
राजेंद्र भारती पर इस सजा का सीधा असर उनकी विधायकी पर पड़ सकता है। कांग्रेस पार्टी और मध्य प्रदेश की राजनीतिक पार्टियों में यह मामला चर्चा का केंद्र बन गया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि अदालत की अपील प्रक्रिया पूरी नहीं होती या सजा पक्की हो जाती है, तो विधायक की विधायकी खतरे में आ सकती है। वहीं, इस मामले ने राज्य के सहकारी बैंक सेक्टर की पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन पर भी सवाल खड़ा किया है। राजनीतिक और कानूनी दोनों ही स्तरों पर इस विवाद से आगे कई अहम फैसले देखने को मिल सकते हैं।
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