नया मुख्यमंत्री तय, लेकिन खाली खजाना बना सबसे बड़ा सवाल—क्या बिहार संभाल पाएगा आर्थिक संकट का बोझ?

Bihar News: बिहार में नई सरकार के गठन की प्रक्रिया तेज हो गई है और जल्द ही नए मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा होने की संभावना है। हालांकि, सत्ता परिवर्तन के इस उत्साह के बीच राज्य की आर्थिक स्थिति गंभीर चिंता का विषय बनकर सामने आई है। हालात ऐसे हैं कि शपथ लेने वाले नए मुख्यमंत्री के सामने सबसे पहली और बड़ी चुनौती वित्तीय संकट को संभालने की होगी। राज्य के कई हिस्सों से लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं कि कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिल रहा है और विकास कार्यों से जुड़े भुगतान भी लंबित हैं। सरकारी खजाने पर बढ़ता दबाव यह संकेत दे रहा है कि स्थिति सामान्य नहीं है और तत्काल सुधारात्मक कदमों की जरूरत है।

वेतन संकट और ठेकेदारों का बकाया 

राज्य में वेतन भुगतान में देरी ने लाखों कर्मचारियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक विभागों से जुड़े लगभग 5 से 5.5 लाख कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिल पा रहा है। कई जिलों जैसे सहरसा, मधुबनी, गोपालगंज, सीतामढ़ी और पूर्वी चंपारण में यह समस्या ज्यादा गंभीर बताई जा रही है। इसके साथ ही ठेकेदारों का भुगतान भी लंबे समय से अटका हुआ है, जिससे निर्माण कार्यों की गति धीमी पड़ गई है। अनुमान के मुताबिक सड़क, भवन और ग्रामीण विकास से जुड़े विभागों में 12 से 15 हजार करोड़ रुपये का भुगतान लंबित है। इसका सीधा असर विकास परियोजनाओं पर पड़ रहा है और कई जगह काम अस्थायी रूप से रुकने की स्थिति में पहुंच गया है।

आर्थिक दबाव के पीछे की वजहें 

विशेषज्ञों के अनुसार बिहार की आर्थिक स्थिति कई कारणों से दबाव में है। सबसे बड़ा कारण राज्य की सीमित खुद की आय है, जो कुल बजट का केवल 20 से 25 प्रतिशत ही है। बाकी बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार के अनुदान और हिस्सेदारी पर निर्भर रहता है। इसके अलावा सामाजिक योजनाओं पर बढ़ता खर्च भी खजाने पर भारी पड़ रहा है। महिलाओं को आर्थिक सहायता, पेंशन, छात्रवृत्ति और मुफ्त राशन जैसी योजनाओं पर हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। इन सभी योजनाओं का कुल वार्षिक खर्च 35 से 40 हजार करोड़ रुपये के करीब पहुंच चुका है। जब आय और खर्च में संतुलन बिगड़ता है, तो वित्तीय दबाव बढ़ना स्वाभाविक हो जाता है।

 नए मुख्यमंत्री के सामने कठिन परीक्षा

बिहार पर सार्वजनिक कर्ज का बोझ भी लगातार बढ़ता जा रहा है, जो अब 3.5 से 4 लाख करोड़ रुपये के बीच पहुंच चुका है। हर साल सरकार को केवल ब्याज और किस्त चुकाने में ही लगभग 30 से 35 हजार करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इससे विकास और प्रशासनिक कार्यों के लिए उपलब्ध राशि सीमित हो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राजस्व बढ़ाने, खर्च नियंत्रित करने और निवेश आकर्षित करने जैसे ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में स्थिति और जटिल हो सकती है। नए मुख्यमंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वे राज्य के वित्तीय संतुलन को कैसे सुधारते हैं और कर्मचारियों से लेकर विकास योजनाओं तक सभी को समय पर फंड कैसे उपलब्ध कराते हैं।

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