Rupee vs Dollar: भारतीय मुद्रा बाजार से इस वक्त की सबसे बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आ रही है। मंगलवार को इंटरबैंक फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में भारतीय रुपये ने अपने इतिहास का सबसे बुरा दौर देखा। डॉलर की बढ़ती ताकत और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच रुपया 12 पैसे और टूटकर 92.40 के नए लाइफटाइम लो (सर्वकालिक निचले स्तर) पर बंद हुआ। दिन के कारोबार के दौरान एक वक्त ऐसा भी आया जब रुपया 92.47 के खतरनाक स्तर तक जा गिरा था। पिछले कुछ दिनों से जारी यह गिरावट न केवल निवेशकों की नींद उड़ा रही है, बल्कि आम आदमी के बजट पर भी बड़ा खतरा पैदा कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गिरावट का यह सिलसिला नहीं थमा, तो आने वाले दिनों में इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर खाने के तेल तक सब कुछ महंगा हो सकता है।
कच्चे तेल की ‘आग’ ने बिगाड़ा घरेलू मुद्रा का गणित
रुपये की इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे सबसे बड़ा विलेन कच्चा तेल (Crude Oil) बनकर उभरा है। ग्लोबल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 2.65% का बड़ा उछाल देखने को मिला है, जिससे कीमतें 102.86 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। चूंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 80% से अधिक हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने का सीधा मतलब है कि भारत को डॉलर में अधिक भुगतान करना पड़ रहा है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है और रुपये की वैल्यू गिर जाती है। इसके साथ ही, फरवरी महीने के व्यापार घाटे के आंकड़ों ने भी आग में घी डालने का काम किया है। फरवरी में भारत का व्यापार घाटा 27.1 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 24% अधिक आयात की ओर इशारा करता है।
मिडिल ईस्ट संकट और ‘होर्मुज’ का डर: सहमे निवेशक
ग्लोबल मार्केट में रुपया गिरने की दूसरी बड़ी वजह पश्चिम एशिया (Middle East) में बढ़ता तनाव है। युद्ध के चलते सप्लाई चेन पूरी तरह बाधित होने की कगार पर है। सबसे बड़ी चिंता ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) को लेकर है। अगर यह समुद्री रास्ता बंद होता है, तो वैश्विक व्यापार पूरी तरह चरमरा जाएगा। इसी डर के कारण विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) भारतीय बाजार से अपना पैसा तेजी से निकाल रहे हैं। सोमवार को ही विदेशी निवेशकों ने 9,365.52 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। जब विदेशी निवेशक अपना निवेश निकालकर ले जाते हैं, तो वे रुपये को बेचकर डॉलर खरीदते हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता जाता है।
महंगाई का ‘थोक’ वार और क्या है आगे का रास्ता?
रुपये की कमजोरी केवल शेयर बाजार तक सीमित नहीं है, इसका असर अब थोक महंगाई दर (WPI) पर भी दिखने लगा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, थोक महंगाई 11 महीने के उच्चतम स्तर 2.13% पर पहुंच गई है। आयात महंगा होने से देश के भीतर निर्माण और परिवहन की लागत बढ़ेगी, जिसका सीधा असर रिटेल महंगाई पर पड़ेगा। हालांकि, इस बीच राहत की बात यह रही कि घरेलू शेयर बाजार (सेंसेक्स और निफ्टी) में तेजी ने रुपये को और ज्यादा गिरने से रोक लिया। अब पूरी दुनिया की नजरें अमेरिकी फेडरल रिजर्व और बैंक ऑफ इंग्लैंड की आगामी बैठकों पर टिकी हैं। यदि वहां ब्याज दरों में बदलाव होता है, तो रुपये की चाल में और अधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
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