RBI MPC Decision: केंद्रीय बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने बुधवार, 8 अप्रैल, 2025 को नई मौद्रिक नीति समिति (MPC) बैठक के फैसले की घोषणा की। इस बैठक में मुख्य ब्याज दर यानी रेपो रेट को 5.25% पर अपरिवर्तित रखने का निर्णय लिया गया। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि यह फैसला मौद्रिक और आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। इसका मतलब साफ है कि आपके होम लोन, कार लोन और अन्य रेपो लिंक्ड लोन की EMI में कोई बढ़ोतरी नहीं होगी। इस निर्णय से घरेलू उपभोक्ताओं और अर्थव्यवस्था को तत्काल राहत मिली है।
गवर्नर संजय मल्होत्रा की टिप्पणी
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने MPC बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि मौद्रिक नीति में तटस्थ रुख बनाए रखा गया है। उन्होंने बताया कि घरेलू महंगाई पर नजर बनी हुई है और कुल मिलाकर मुद्रास्फीति नियंत्रण में है। हालांकि, खाद्य पदार्थों के दाम में थोड़ी बढ़ोतरी बनी हुई है। गवर्नर ने यह भी कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था जुझारू बनी हुई है और वित्त वर्ष 2026-27 में सकारात्मक ग्रोथ आउटलुक के संकेत हैं। उनका यह संदेश निवेशकों और आम जनता दोनों के लिए आश्वस्तिक है।
पिछले दो साल में ब्याज दरों की स्थिति
RBI की इस बैठक में पिछले दो साल के दौरान ब्याज दरों में कमी का ट्रेंड भी ध्यान में आया। फरवरी 2024 से अब तक केंद्रीय बैंक ने कुल 125 बेसिस प्वाइंट की कटौती की है। दिसंबर 2025 में अंतिम कटौती दर्ज की गई थी। तीन दिन (6–8 अप्रैल) तक चली MPC बैठक में सभी सदस्यों ने सर्वसम्मति से रेपो रेट को स्थिर रखने का निर्णय लिया। ब्लूमबर्ग द्वारा ट्रैक किए गए 33 अर्थशास्त्रियों ने पहले ही अनुमान लगाया था कि वैश्विक और घरेलू परिस्थितियों को देखते हुए RBI दरें यथावत रखेगा। इस निर्णय से वित्तीय बाजारों में स्थिरता बनी हुई है।
महंगाई, GDP और वैश्विक जोखिम
RBI की MPC ने महंगाई के मोर्चे पर ध्यान देते हुए FY26 के लिए औसत मुद्रास्फीति 4.6% रहने का अनुमान लगाया है। तिमाही आधार पर CPI 4% (Q1), 4.4% (Q2), 4.2% (Q3) और 4.7% (Q4) रहने की संभावना है। साथ ही, वित्त वर्ष 2025-26 के लिए GDP ग्रोथ अनुमान को 7.6% से घटाकर 7.3% कर दिया गया है। इसके पीछे मुख्य कारण वैश्विक अनिश्चितताएं और भू-राजनीतिक तनाव हैं। MPC ने मध्य-पूर्व में चल रहे संघर्ष को भी चिंता का कारण बताया। तेल आपूर्ति में बाधा और इंफ्रास्ट्रक्चर के नुकसान से महंगाई बढ़ने और विकास दर धीमी होने की संभावना है। इस प्रकार, आरबीआई की यह तटस्थ नीति न केवल लोनधारकों को राहत देती है बल्कि वित्तीय स्थिरता और भविष्य के आर्थिक जोखिमों के बीच संतुलन बनाए रखने में भी मददगार साबित होती है।
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